अभिज्ञात लिखित कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' की कहानियां, उसके बारे में टिप्पणियां व समीक्षाएं तथा अन्य सूचनाएं
Friday, 4 February 2011
Tuesday, 4 January 2011
सर्पदंश
शिखा पाण्डेय के लिए इंटर्नशिप एक चुनौती बन गयी थी. उसने सोचा भी न था कि डॉक्टरी का यह करियर उसे उस मुकाम पर पहुंचा देगा जहां उसे कठिन विकल्पों में से ही एक को चुनना होगा. कहां तो उसने सोचा था कि वह साइंस की तरक्की का लाभ इस देश के लोगों को पहुंचा सकेगी. खास तौर पर वह गांवों में उन लोगों को राहत देना चाहती थी जो चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में असमय ही दुनिया से कूच कर जाते हैं अथवा उपयुक्त इलाज न हो पाने के कारण छोटी मोटी बीमारियों से भी बरसों जूझते रह जाते हैं और वह बीमारी देखते देखते ही तिल से ताड़ बन जाती है.
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से वह बीएससी कर रही थी कि उसके सपनों को पंख मिल गये और वह प्रतियोगी परीक्षा में उत्तीर्ण हो गयी और कोलकाता के एक मेडिकल कॉलेज में उसका दाखिला हो गया. चार वर्ष का पाठयक्रम उसने पूरा कर लिया था अब छह माह का इंटर्नशिप उसे पास करना था जिसके बाद वह स्वतंत्र थी मेडिकल प्रेक्टिस के लिए. इस बीच उसके घर की हालत सोचनीय होती चली गयी थी. पिता ने ज़मीन बंधक रख दी थी. छोटी दो बहनें कुंवारी थीं और पिता को उम्मीद थी कि डॉक्टर बेटी अपनी कमायी से उन्हें पार लगायेगी. आखिर बेटी का भी तो कुछ कर्तव्य बनता है ऐसे पिता के प्रति जितने लोगों के तमाम भड़कावे के बावजूद उसे इतनी ऊंची तालीम हासिल करने दी.
शिखा की उम्र भी निकली जा रही थी किन्तु उन्होंने उस पर विवाह के लिए जोर नहीं डाला और उसके बाद वाली बेटी निशा का ब्याह दो साल पहले ही कर दिया और हाथ खड़े कर दिये कि अब किसी और बेटी को ब्याहने की उनकी स्थिति नहीं है शिखा ही अपनी नौका खुद पार लगाये और अपनी दो अन्य छोटी बहनों के लिए भी वक्त आने पर घर-बार खोजे.
लोग उन्हें समझाते थे बेटियां दूसरे के घर जाने वाली होतीं हैं. उनसे उम्मीद नहीं पाली जानी चाहिए. बहुत होगा तो वह इतना करेगी कि अपने लिए कोई डॉक्टर वर खोज लेगी लेकिन अन्य कोई उम्मीद करना बेकार है. लेकिन पिता को अपनी आस्था के लिए एक ठौर मिल गया था और वह थी उनकी बेटी शिखा. ईश्वर और शिखा उनके जीवन के दो ध्रुव बन गये थे जिसके बीच उनका जीवन परिक्रमा करता रहता था. इसमें भी शिखा की मुख्य भूमिका होती और ईश्वर उसके सहायक. उनकी चर्चा शिखा से शुरू होती और शिखा पर ख़त्म.
कभी शिखा छुट्टिओं में बनारस से कुछ किमी दूर स्थित अपने गांव लाखी जाती तो पिता की अपने से लगायी गयी उम्मीदों से सहम जाती. यदि वह उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी तो जाने क्या होगा....
यूं तो शिखा ने सारी बाधाएं पार कर ली थी. घर- परिवार व जीवन के अन्य उतार चढ़ाव की बाधाएं को अपने दिलो दिमाग से निकाल कर अपने करियर के बारे में सोचती और ध्येय को पाने में जुटी रहती. अब मंज़िल करीब थी. वह जल्द से जल्द मेडिकल प्रेक्टिस शुरू कर अपने परिवार की आर्थिक बाधाओं को दूर करना चाहती थी. मिट्टी का घर भी अब गिरने गिरने को था. पिछली बरसात वह झेल गया था जैसे तैसे लेकिन इस बार की वर्षा वह निकाल पायेगा इसमें संदेह था.
शिखा को इंटर्नशिप के लिए बंगाल दक्षिण 24 परगना जिले के एक ग्रामांचल के सरकारी अस्पताल दिया गया था जहां उसे छह महीने चिकित्सा करनी थी. उसे अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टरों के दिशा-निर्देश में काम करना था. कोलकाता से दो घंटे के बस के सफर के बाद वह अस्पताल पहुंचती और काम के बाद वापस लौटती. अस्पताल के हालत उसके लिए विस्मयकारी थे. किताबों से बाहर निकल कर व्यवाहरिक दुनिया में प्रवेश उसके लिए नया अनुभव था. उसने सोचा भी न था कि उसके ख्वाबों की हक़ीकत ऐसी होगी और उसके आदर्श धरे के धरे रह जायेंगे. मेडिकल सांइस की तरक्की को यहां की व्यवस्था मुंह चिढ़ा रही थी. अस्पताल में कुछ आठ दवाएं थी जिनसे उसे लोगों की तमाम बीमारियों का इलाज करना था. ऊपर से तुर्रा ये कि किसी भी मरीज को यह नहीं बताना था कि अमुक दवा नहीं है. दवा न भी हो तो मरीज के इलाज का नाटक जारी रखना था क्योंकि ऐसा न करने पर लोगों की नाराजगी का अस्पताल निशाना बनेगा और सरकार भी. व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न लग जायेगा. मामला विधानसभा में उठ सकता है. मीडिया तो यूं भी फुटेज के चक्कर में तिल को ताड़ बनाता रहता है. विपक्ष को बैठे बिठाये वामपंथी सरकार के खिलाफ़ मुद्दा मिल जायेगा. अधिक से अधिक उन्हें आज़ादी थी मामले को कोलकाता के किसी अन्य अस्पताल को रेफर कर दिया जाये. किन्तु ऐसे मामलों में भी कैफियत देनी पड़ेगी. शिखा ने गांव के किसी अस्पताल में प्रेक्टिस का विचार सिरे से खारिज कर दिया. ना वह बिना दवा के इलाज का स्वांग नहीं करेगी.
शिखा को अभी कुल चार दिन ही हुए थे और वह यहां की व्यवस्था से परिचित हो चली थी. परिचित ही नहीं हुई थी बल्कि वह इस व्यवस्था का हिस्सा बनने का मन बना चुकी थी. उसके पास कोई विकल्प नहीं था. इंटर्नशिप उसे पूरी करनी थी. मन कड़ा कर लिया था और वह व्यवस्था का कोई असर दिलो दिमाग पर न पड़े इसकी पूरी कोशिश में लगी थी. वह अपने मन को विचलित नहीं करना चाहती थी. वह लक्ष्य पर निगाह गड़ाये हुए थी. उसकी आंखों के सामने पिता थे. उनके सपने थे. बहनें थी उनकी जिम्मेदारियां थीं. गांव के लोग थे जिनकी वह शान व पहचान थी. गांव की पहली डॉक्टर वह बनेगी.
अस्पताल में उस दिन जैसे ही वह पहुंची तो पाया कि सर्पदंश का मामला आया हुआ है. बाईस साल का युवक था जिसे गांव वाले चारपाई पर लिटाकर ले आये थे. विधवा मां, दो कुंवारी बहनें धाड़ें मार-मार के रो रही थीं. और गांव के लोग थे जो उन्हें दिलासा दे रहे थे कि वह ठीक हो जायेगा. लो डॉक्टर आ गयी.... लोगों के चेहरे का तनाव थोड़ा कम हुआ. अस्पताल में फिलवक्त कोई और डॉक्टर था सो जिम्मेदारी उस पर थी. उसने पता किया सर्पदंश से निजात का कोई इंजेक्शन अस्पताल में नहीं था. उसे इलाज का अभिनय भर करना था. उसके समक्ष एक चुनौती थी और उसके इम्तहान की घड़ी. उसने मन कड़ा कर लिया. उसने पढ़ा था ज्यादातर सांप विषैले नहीं होते किन्तु कई लोग दहशत से मर जाते हैं. उसका अभिनय काम आ सकता था. इलाज के अभिनय से प्रभावित व्यक्ति का मनोबल ऊंचा उठ सकता था उम्मीद थी वह ठीक हो जायेगा. दवा से नहीं अपने-आप. उसने भगवान से मनाया कि जिस सांप ने काटा है वह विषैला न हो. किन्तु उसका कामनाएं फलीभूत होती नज़र नहीं आ रही थी.
इसी बीच एक और घटना घटी जिसने उसे झकझोर कर रख दिया. युवक की हमउम्र एक युवकी रोती बिलखती अस्पताल पहुंची. उसने अपने पास सिंदूर की डिबिया रखी थी. लगभग बेसुध होते युवक के समक्ष वह फूट पड़ी-‘मैं नहीं जानता तुम बचोगे कि नहीं. लेकिन तुम जान लो कि मैं तुम्हारी हूं. मैं तुम्हारी विधवा बन कर जी लूंगी मगर दूसरे से हरगिज़ शादी नहीं करूंगी. मैंने बहुत कोशिश की कि गांव वालों से अपना प्रेम छिपा लूं. मैं जानती हूं कि मेरे पिता इस शादी के लिए कभी राजी नहीं होंगे फिर भी मैं कोशिश में थी कि कभी न कभी उन्हें मना लूंगी. मगर अब वक्त नहीं बचा है. पता नहीं क्या होगा. तुम नहीं भी बचोगे तो यह जानकर जाओ कि मैं तुम्हारी हूं.’
और उसने अस्पताल में गांव वालों के सामने युवक से सिन्दूर अपनी मांग में भरवा ली. शिखा दहल गयी. उसकी आंखों से सब्र आंसू बन कर बह निकला. इस बीच युवक अचेत हो गया था. शिखा ने मन कठोर कर लिया और युवती से पूछा-'क्या तुम्हारे पास गाड़ी है?'
युवती के हां कहने पर उसने कहा-‘मैं जान गयी हूं इसे किस सांप ने काटा है. वह बहुत जहरीला है. उसका इलाज आसान नहीं. तुम इसे लेकर जल्द से जल्द कोलकाता मेडिकल कालेज चली जाओ. यहां उसका इलाज नहीं हो पायेगा.’
युवती ने लोगों की मदद से फौरन युवक को कार में बिठाया और गाड़ी चल पड़ी. लोगों को जैसे ही पता चला कि अस्पताल में इलाज संभव नहीं गुस्सा फूट पड़ा. अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टरों के लिए गालियां दागी जाने लगीं. इधर गांव के लोगों ने अस्पताल में तोड़फोड़ शुरू कर दी थी. शीशे की खिड़की को तोड़ता हुआ एक सनसनाता पत्थर उसके सिर पर लगा था और वह अचेत हो गयी.
उसे जब होश आया तो पाया कि वह अस्पताल के एक बेड पर पड़ी है और भारी संख्या में पुलिस बल अस्पताल में तैनात है. उसके कमरे के बाहर भी पुलिस थी. उसे सिर पर लगी चोट का भी अहसास हुआ किन्तु मन में संतोष का भी अनुभव किया कि सब कुछ के बावजूद वह एक युवक की जान बचाने में सफल रही. इस बीच उसका बयान लिया गया. वहां उसके सीनियर डॉक्टर्स भी थे. पता चला कि सर्पदंश से युवक की मौत हो गयी है. लोग अस्पताल के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं. एहतियात के तौर पर पुलिस बुलायी गयी है.
सूखा सूखा कितना सूखा
वह अदना सा अंशकालिक पत्रकार था। एक बड़े अख़बार का छोटा सा स्ट्रिंगर। उसका ख़बरों की क़ीमत शब्दों के विस्तार पर तय होती थी, ख़बरों की गहराई और महत्त्व पर नहीं। जिस ख़बर के जुगाड़ में कई बार उसका पूरा दिन लग जाता उसकी लम्बाई कई बार तीन-चार कालम सेंटीमीटर होती।
ऐसा होने पर वह अपने आपको ठगा सा महसूस करता। जिन दिनों अख़बार के विज्ञापन की दरें 215 रुपये प्रति कालम सेंटीमीटर हुआ करती थी उसके छपे समाचार पर 2 रुपये 15 पैसे प्रति कालम सेंटीमीटर मिलता था अर्थात सौंवा हिस्सा। पांच बरस बीत गये विज्ञापन की दरें बदलीं मगर नहीं बदला तो उसका मानदेय। इसके अलावा एक सुनिश्चित मानदेय रिटेनरशिप के नाम पर तीन सौ रुपये प्रतिमाह मिलता था। यह अनायास नहीं था कि स्ट्रिंगर ने स्फीति को अपनी पत्रकारिता का गुण बना लिया। ख़बर में अनावश्यक फैलाव और दुहराव न होता तो उसकी दैनिक कमाई एक रिक्शावाले के बराबर भी न हो।
और उधर डेस्क की ड्यूटी इस काम के लिए लगी होती थी कि स्ट्रिंगरों की ख़बरों की स्फीति और अनावश्यक हिस्सों को काटा-छांटा जाये। काट-छांट करने वाले मज़े में थे। कम्पनी की तरफ़ से उन्हें तमाम सुविधाएं थीं। वे एसी युक्त कार्यालय में बैठे-बैठे स्ट्रिंगरों की मूर्खताओं की चर्चा कर फूले न समाते और अपने को विद्वान मानने का वहम पाले रहते। एक ही ख़बर पर दोहरी मेहनत होती थी। सब कुछ अरसे से ठीक-ठाक चल रहा था किन्तु एक दिन स्ट्रिंगर की पेशागत ज़िन्दगी में उथल-पुथल मच गयी।
हुआ यूं कि उस दिन उसके पास ख़बरों का खासा टोटा था और उसने जिले के कुछ हिस्सों में सूखे की एक खबर गढ़ दी। यूं भी बारिश के दिनों में कई दिन से बारिश नहीं हुई थी। उसने अनुमान लगाया था कि यह हाल रहा तो सूखा पड़ सकता है। उसने ख़बर बहुत हल्के तौर पर लिखी थी उसे क्या पता था कि डेस्क उसे खासा तूल दे देगा। डेस्क पर एक अति उत्साही जीव आये हुए थे। स्ट्रिंगर कोलकाता के एक दूर-दराज़ जिले का था जो जिला मुख्यालय से भी काफी दूर एक क़स्बे में रहता था जहां से वह अपनी खबरें फ़ैक्स से भेजता था।
फ़ैक्स करने के लिए उसे तीन किलोमीटर दूर बाज़ार में आना पड़ता था। सूखे की ख़बर को फ़ैक्स तो उसने किया था किन्तु दूसरे दिन वह ख़बर लगी नहीं। अगले दिन वह अन्य ख़बरें फ़ैक्स करने गया तो वहीं से फ़ोन कर सूखे की स्टोरी के सम्बंध में डेस्क से पूछा तो कहा गया-‘तुम लोगों को क्या पता कि ख़बर किसे कहते हैं और कैसे बनती है? तुम तो बस वह करो, जो कहा जा रहा है। यह बहुत बड़ी ख़बर है जिसे तुमने बहुत मामूली ढंग से लिखी है।’
स्ट्रिंगर किन्तु-परन्तु करता रह गया और दूसरी ओर से फ़ोन काट दिया गया। अगले दिन उसने वही किया जो कहा गया था। सरकारी महकमे से जिले में सूखे से सम्बंधित पिछले रिकार्ड जुटाये और भेज दिया। अगले दिन सूखे को लेकर जो समाचार छपा उससे वह खुद हैरत में पड़ गया और उसका कलेजा कांप गया। खबर पहले पेज़ पर थी और कहीं इंटरनेट आदि से मैनेज किया गया फ़ोटो था दरकी हुई ज़मीन का। ख़बर की विषयवस्तु के साथ खिलवाड़ किया गया था और जो सूखे की आशंका उसने व्यक्त की थी उसे डेस्क ने बदलकर सूखा पड़ा कर दिया था। उसे लगा कि अब तो उसकी स्ट्रिंगरशिप गयी। रोज़गार का यह रास्ता भी बन्द। वह आशंका से बुरी तरह त्रस्त हो गया।
कोलकाता के दूसरे अखबारों में सूखे की ख़बर सिरे से नदारत। सिर्फ़ एक अख़बार में ख़बर थी। उसे एक्सक्लूसिव माना गया और किन्तु बाक़ी अख़बारों से संवाददाता और फ़ोटोग्राफ़र भेजे गये सूखे के कवरेज के लिए। चूंकि वह सुदूर जिला था अधिकतर अख़बारों में स्टाफ़ रिपोर्टर नियुक्त नहीं थे इसीलिए स्टाफ़ रिपोर्टर भेजे गये थे। जिले में कुछ दिनों तक सूखे के
कवरेज के लिए।
पत्रकारों ने एक-दूसरे से सम्पर्क किया और एक साथ एक ही ट्रेन से सूखाग्रस्त जिले में पहुंचे। इलेक्ट्रानिक मीडिया भी साथ था। रास्ते में ही तय हो गया था कि क्या करना है। जिस स्ट्रिंगर ने यह ख़बर सबसे पहले ब्रोक की है उससे सम्पर्क साधना है। उस अख़बार का फ़ोटोग्राफ़र इस ट्रेन से जा रहा था, जिसे वहां पहुंचते ही स्ट्रिंगर स्टेशन पर रिसीव करने वाला था। बाक़ी पत्रकार भी उसी के भरोसे थे कि वह प्रभावित इलाके का बासिन्दा है इसलिए स्थिति से पूरी तरह वाक़िफ होगा और उन सबकी मदद करेगा।
स्टेशन के पास ही के होटल में सारे पत्रकार ठहरने वाले थे जहां से वे स्टोरी कवर करके फ़ोन और ईमेल व अन्य साधनों से भेजने वाले थे। इतने सारे रिपोर्टर-फोटोग्राफ़र जब स्टेशन पर एक साथ उतरे कोस्ट्रिंगर के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। वह मन ही मन भगवान को याद करने लगा जबकि वह विचारधारा से किसी हद तक मार्क्सवादी था। होटल में जब सब फ्रेश हो लिए और नाश्ते-पानी के बाद उसके साथ कूच करने के लिए तैयार हुए तो उन्हें बताया गया कि यह जिला अत्यंत पिछड़ा हुआ है और ज़्यादातर गांवों में सड़कें नहीं पहुंची हैं सो उन्हें पैदल ही चलना होगा।
स्ट्रिंगर बेमतलब उन्हें खेतों और पतली पगडंडियों पर देर तक चलाता रहा फिर एक बड़े से तालाब के पास ले गया जो अरसे से सूखा पड़ा था। उसने बताया –‘यह तालाब पानी से लबालब भरा रहता था जो अब सूख गया है।’ उसने वह परती ज़मीनें दिखायी जिस पर कभी खेती हुई ही न थी और दरारें पड़ी हुई थीं और कहा-‘इसमें फसलें लहलहाती हैं जो अब सूखे की वज़ह से बेहाल हैं।’
शहरी पत्रकारों को ग्राम्य जीवन की न तो पूरी जानकारी थी और ना ही जानकारी हासिल करने की ललक और ना ही कोई दूसरा चारा। वह दो-एक ऐसे नलकूपों तक ले गया जो सरकारी खानापूरी के लिए लगाये तो गये थे लेकिन जिनमें लगने के बाद भी कभी पानी नहीं आया था। एक सूखा कुंआ भी उसने दिखाया जो बरसों से उसी अवस्था में था किन्तु उसके बारे में जानकारी दी कि वह इस सूखे के कारण ही इस अवस्था में है। उसकी बतायी गयी सूचनाएं मीडिया के लोग दर्ज़ करते रहे। तस्वीरें उतारी गयीं।
टीवी वालों ने भी स्थलों की बाइट ली। उन्हें एक पेड़ की छांह में बिठाकर स्ट्रिंगर पास ही के गांव में गया और लोगों को समझा-बुझाकर वहां ले आया जो सूखे की गवाही देने को तैयार थे। गांव वालों को उसने समझाया था कि यदि वे सूखे की गवाही देंगे तो उन्हें सरकार से पैसे मिलेंगे। लोग खुशी-खुशी गढ़ा हुआ झूठ बोलने को तैयार हो गये। दो-तीन युवक साइकिल से पड़ोस के गांव भी दौड़ा दिये गये जो गढ़े झूठ का साथ देने के लिए तैयार किये जाने के मक़सद से भेजे गये। फिर क्या था सूखे के पुराने दिनों को गांव वाले याद करते और इस सूखे के बारे में भी वैसा ही बयान देते। ख़बरें बनने लगीं। कैमरों के फ़्लैश चमकने लगे। टीवी वाले अलग-अलग लोगों के बयान लेते रहे।
अगले दिन सारे अख़बारों में सूखा और उसकी तस्वीरें छा गयीं। टीवी पर भी सूखा दिखा। मीडिया ने दूसरे दिन अपनी कलाकारी दिखायी लोगों से कहा गया कि वे वर्षा के लिए पूजा-अर्चना करें, नमाज़ पढ़ें ताकि उसका कवरेज शानदार दिखायी दे। गांव वालों ने ऐसा ही किया। मीडिया के वहां होने की ख़बर पाकर स्थानीय विधायक, सांसद और कलेक्टर सहित तमाम अधिकारी वहां पहुंच गये। उन सबके चेहरे पर रौनक थी। उनके मन में पिछले सूखे से हुई कमाई की याद ताज़ा हो आयी थी। और इस बार तो सूखा छप्पर फाड़ कर आया था। बैठे बिठाये। सरकारी राहत का ज़्यातातर माल ज़ेब में आने की संभावना बन रही थी। उन्हें तो पता ही न था कि कब सूखे ने यूं उनके यहां दस्तक़ दी थी। अख़बारों के रास्ते।
सब मीडिया के सामने सूखे की भयावहता का बढ़-चढ़ कर वर्णन कर रहे थे और सरकार से खासी मदद मांग रहे थे। टीवी पर ही उन्होंने सुना कि सम्बंधित मंत्री ने पहले तो मीडिया की ख़बरों के आधार पर प्रधानमंत्री को तत्काल पत्र लिखा था और सूखा से निपटने और राहत के लिए करोड़ों रुपयों की पुरज़ोर मांग कर दी थी। वे ज़ल्द ही इलाके के दौरे पर आने वाले थे। मुख्यमंत्री राहत कोष से भी राहत राशि की घोषणा कर दी गयी थी।
प्रधानमंत्री ने भी आश्वासन दिया था। तीन दिन से मीडिया में सूखे की ख़बरों का ज़बर्दस्त कवरेज रहा। खेत का दरकी हुई ज़मीन, सूखे तालाब, नलों की सूखी हुई टोंटियां, चारे के अभाव में दुबले हुए मवेशी न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में दिखायी दे रही थीं। सूखे के प्रचार दौड़ में मीडिया एक-दूसरे को पछाड़ने में लगे थे और यह स्ट्रिंगर के होश उड़ाये हुए था। उसका दिल रह-रह कर डूबता-उतराता रहा। यह सब उसी की ग़ल्तियों का नतीज़ा है। उसका फ़रेब सामने आया तो क्या होगा? क्या पता उसे लम्बी सज़ा ही न हो जाये? तीस-चालीस रुपये की हवाई स्टोरी उसे कितनी महंगी पड़ेगी वह सोच नहीं सकता था। और अब सच स्वीकार करने का कोई रास्ता न बचा था।
यह सब कुछ चल रहा था कि अचानक सब कुछ बदल गया एकाएक तेज़ बारिश होने लगी। अधिकारियों के चेहरे उतर गये। सांसद और विधायक की गाड़ियां एकाएक वहां से नदारत हो गयीं लेकिन जो निराश नहीं था वह था स्ट्रिंगर। चलो सूखे से पीछा छूटा। उसने चैन की सांस ली। खुश था मीडिया भी। स्टोरी में ट्विस्ट आ गया था।
लोगों से मीडियाकर्मियों ने गुजारिश की कि वे बारिश में नाचें। लोगों की बारिश में नाचती तस्वीरें और टीवी फुटेज लिये गये। यह सूखे से निज़ात पाये लोगों का उल्लास था जो मीडिया की नज़रों से दुनिया ने देखा। इसी बीच स्ट्रिंगर के आफ़िस से मोबाइल पर फ़ोन आया। फ़ोन पर स्ट्रिंगर को सूखे के कवरेज में पहल के लिए बधाई दी गयी और बताया गया कि पुरस्कार स्वरूप उसका रिटेनरशिप दो सौ रुपये प्रतिमाह तत्काल प्रभाव से बढ़ा दिया गया है।
Friday, 2 July 2010
कहानियों का कलाइडोस्कोप
साभारःद संडे इंडियन, 11 जुलाई 2010
अभिज्ञात की कहानियों का यह संग्रह उनकी कुल दो दर्जन प्रकाशित अप्रकाशित कहानियां समेटे हुए है. इनमें किंचित लम्बी अधिकतर छोटी तथा कुछ लघु कथाएं शामिल हैं.अभिज्ञात की इन कहानियों की खूबी यह है कि इनकी किस्सागोई पाठकों को कहानी के साथ लिए चलती है. पढ़ने वाला कहानी का महज पाठक न होकर उसका एक हिस्सा बन जाता है. उल्लेखनीय बात यह है कि अभिज्ञात की कहानियों का सिर्फ कथ्य और उसके लिहाज से उसकी भाषा ही नहीं बदलती पूरा का पूरा शिल्प और शैली भी बदल जाती है. इन दो दर्जन कहानियों को पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है कि यह किताब जैसे कहानियों का पहुदर्शी या एक कैलाइडोस्कोप हो या फिर अलग-अलग रंग-ढंग की कथा शैलियों से बना एक खूबसूरत गुलदस्ता.
अभिज्ञात की कहानियों का कथ्य तथा बुनावट की विविधता को देखकर लगता है कि उनका अनुभव फलक काफी विस्तृत है.लेखक पेशे से पत्रकार हैं, इसलिए यह बात आसानी से समझी जा सकती है. आधुनिकता के नाम पर बेवजह अमूर्तता या अपना दर्शन बघारने की बजाए अभिज्ञात ने कहानियों को धरातल पर ही रखा. सहज, सुबोध और तरल. इसी के चलते अभिज्ञात की कहानियां समाज के सरोकारों, संवेदनाओं, समस्याओं, रिश्ते नातों की जटिलताओं को भी बिना किसी तरह के शब्दाडंबर फैलाए, उपदेश पिलाये बेहद साफगोई के साथ उकेरती हैं. वह चाहे व्यवस्थागत खामियों की बात कर रहे हों या समाजिक विद्रूपता की, बिना अतिरंजकता का सहारा लिए वे चौंकाते हैं और उस पर ध्यान आकर्षित कर के लिए मजबूर करते हैं. उनकी यह खूबी उन्हें बड़े रचनाकार की पांत की तरफ ले जाती है.
कहानी संग्रह में शामिल सर्पदंश, शिनाख्त नहीं जैसी कुछ कहानियां साधारण हैं लेकिन एक हिट भोजपुरी फिल्म की स्टोरी, क्रेजी फैंटेसी की दुनिया या फूलबागान का सपना जैसी कहानियां अभिज्ञात के कथा कौशल की बेहतर परिचायक हैं. कहानी विधा में रुचि रखने वाले पाठकों को यह पुस्तक निराश नहीं करेगी.
Monday, 14 June 2010
अभिज्ञात की दुनिया में सच के 25 रूप
सुधीर राघव
( हिन्दुस्तान, चंडीगढ़ 13 जून 2010 को प्रकाशित)
अभिज्ञात अपनी बसाई दुनिया लेकर फिर पाठकों के सामने हाजिर हैं। यह दुनिया है उनके लिए जो सपने देखना पसंद करते हैं, मगर हर कहानी पाठक को सपनों के आकाश से हकीकत के उस धरातल पर ले आती है, जो कढ़ाई में खदकते हलवे की तरह बुलबुले छोड़ रहा है। हर बुलबुला जिंदगी के एक सच से पहचान करवाता है और अपना स्वाद छोड़ जाता है। सच के इतने रूप लेखक अपनी जिंदगी के चारों ओर से ही तलाश कर लाया है। अभिज्ञात के अंदर छुपे पत्रकार की पारखी नजर और संवेदनशील कवि इस सच को शब्दों की सजीवनी से साक्षात करता है। मिस्र की संरक्षित ममियां भले ही अपने युग को फिर कभी नहीं जिएंगी पर अभिज्ञात के पात्र लौट-लौटकर आते हैं और सीधे पाठक के जेहन में उतर जाते हैं।
इस संग्रह की अधिकतर कहानियां कादम्बिनी, हंस, वागर्थ, वर्तमान साहित्य और वामा जैसी प्रतिष्ठित साहित्यक पत्रकाओं में छप चुकी हैं। पहली ही कहानी -कॉमरेड और चूहे- हमारे चिकित्सा शिक्षण संस्थानों के हालात बयां करती है कि किस तरह एक आदर्श को कुतरने के लिए यहां के चतुर्थश्रेणी कर्मचारी ही काफी हैं। स्वार्थ अभिज्ञात की लेखनी से नए अर्थ लेकर निकलता है, कहानी -औलाद- में। एयरहोस्टेस मां अपने नाजायज नवजात को न बचाने के लिए डॉक्टर से कहती है, मगर डॉक्टर उसे इसलिए बचाना चाहता है, क्योंकि यह उसका पहला ही केस है। लघुकथा -बंटवारे-यह बता कर चौंकाती है कि जब कोई घर बंटता है तो सबसे ज्यादा खुश भिखारी होते हैं कि अब उन्हें एक की जगह चार घर से भीख मिलेगी। -तीसरी बीवी-कोलकात्ता में बसे बांग्लादेशियों की बदतर जिंदगी की झलक दिखाती है। आज स्त्री भले अपनी मर्जी से प्रेम विवाह करे मगर पुरुष उसके आर्थिक और यौन शोषण पुराने हथकंडों अपना कर ही करता है। यहां कोई बदलाव नहीं है। औरत की आजादी किसी को बर्दाश्त नहीं। भले ही कुलटा कहानी में किसी पात्र का नाम नहीं है मगर यह कुलटा की गाली से भयभीत सभी स्त्रियं के साझा डर का दर्शाती है। पति-पत्नी के बीच नौकझौंक की एक बहुत ही रोचक कहानी है फिर मुठभेड़। यह बिल्कुल नए अंदाज में हैं, शादी की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर भी यह जोड़ा दिनभर यह वादा करने के बाद कि आज नहीं लड़ेंगे रात को जरा सी बात पर आपस में मारपीट करके ही सोता है। इस कहानी संग्रह में कुल 25 कहानियां हैं और सब सच के इतने ही रूप दिखाती हैं।
इस तरह कहानियां मर्म को बेधती हैं, हूक पैदा करती हैं तो कभी ढांढस बंधाती हैं। इनमें अनुभव, संवेदना और मर्म साथ-साथ चलते हैं। लेखक किसी एक अंदाज में बंधी किस्सागोई नहीं करता, इसलिए पाठक दूर तक उसके साथ चलता है और ऊबता भी नहीं है।
कहानी संग्रह-तीसरी बीवी
प्रकाशक : शिल्पायन
मूल्य : 150 रुपये
आवरण चित्र : डॉ. लाल रत्नाकर
Sunday, 6 June 2010
एक बेचैन करने वाली दुनिया से गुज़रते हुए
-उमेश कुमार राय
एक समय था जब कहानियां आलोचना के आधार पर लिखी जाती थी। कहानियों की भाषा, विषयवस्तु, भूमिका और उनकी इति श्री आलोचना को ध्यान में रखकर ही की जाती थी। लेकिन इधर कुछ समय से इस परंपरा में काफी बदलाव आया है। अब के रचनाकार आलोचनाओं के मानदंडों के आधार कहानियां नहीं लिखते। वे कहानियों में नये प्रयोग कर रहे हैं जिस कारण अब कहानियों के आधार पर आलोचना लिखने की जरूरत महसूस होने लगी है। खास तौर पर अभिज्ञात जैसे कथाकारों की कहानियों की व्याख्या के लिए कहानी आलोचना के मानकों को अधिकाधिक औज़ारों से लैस होना होगा। यथार्थ, फैंटेसी और कल्पना के कलात्मक रचाव के साथ समकालीन जटिलताओं को उन्होंने जिस तरीके से अपनी कहानियों उकेरा है, वह पाठक को भले लगभग सम्मोहित करता हो पर उसकी व्याख्या कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। पत्र-पत्रिकाओं में अपनी दर्जन भर महत्वपूर्ण कहानियों से भी साहित्य जगत का ध्यान अपनी ओर बरबस आकृष्ट करने वाले अभिज्ञात का पहला कहानी संग्रह हिन्दी कहानी की एक महत्वपूर्ण घटना है क्योंकि इसके बाद कहानी का संसार वह नहीं रह गया है जो पहले था। अपनी कहानियों से कहानी का स्वरूप बहुत बारीकी से उन्होंने बदला है। उनके कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' की कहानियां उदय प्रकाश की कहानियों के उदय के बाद एक नया प्रस्थान हैं। संग्रह की कहानियों की शुरुआत दिलचस्प तरीके से होती है और वह अन्त तक पाठक पर अपनी गिरफ्त बनाये रखने में कामयाब हैं। इन कहानियों की एक विशेषता यह है कि इनके नायक शेक्सपीयर के पात्रों की तरह आत्मग्लानि से भरकर आत्महत्या की राह नहीं चुनते बल्कि वे समय की मांग समझकर उन परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं। यह समझौता पाठक को देर तक झकझोरता है और स्थितियों को बदलने में उनकी पहल की भी मांग करता दिखायी देती है। कहानियों में घटनाएं परिस्थितियों से संचालित हैं इसलिए यह कहानियां चुपचाप व्यवस्था की खामियों की तरफ पाठक का ध्यान खींचती हैं और उनकी विसंगतियों को उजागर करती हैं। कहानियों के पात्र यथार्थ से टकराते हैं टूटते हैं, पर पलायन नहीं करते। उनकी जीजिविषा ही उनकी सम्पदा बनती है। तभी तो अपनी
बेटी का भरण पोषण कर पाने में असमर्थ 'तीसरी बीवी' कहानी का नूर अपनी बेटी को हबीब की तीसरी बीवी महज इसलिए बना देता है क्योंकि सर्द रात में उसके पास बिस्तर नहीं है। जश्न कहानी का करमु कौवे का मांस खाने से भी नहीं हिचकता। संग्रह की सभी कहानियों के पात्र और
नायक जीवन से जुड़े हुए हैं। कई कहानियों के नायक ड्राइवर, मिल मजदूर, झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाले लोग हैं जिन्हें हमलोग हर रोज आसपास देखते और रूबरू होते हैं लेकिन उनकी वस्तुस्थिति से हम अपरिचित है।
संग्रह की पहली कहानी कामरेड और चूहे हंस में प्रकाशित होने के बाद चर्चा में आयी थी। कहानी के माध्यम से कम्युनिस्ट शासित राज्यों में सर्वहारा वर्ग की दारुण स्थिति को दर्शाया गया है और साथ ही इसके माध्यम से यह बताने की कोशिश की गयी है कि यदि गरीब को उनका उचित मेहनताना ना मिले तो किस तरह वे संवेदन शून्य हो जाते हैं और शव को भी टुकड़ों टुकड़ों में बेच देते हैं। इसमें व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार को भी दिखाया गया है जिसके चलते अच्छी नीयत से काम करने वालों को पछतावे के सिवा कुछ और हाथ नहीं लगता। लोगों की कुर्बानियां व्यर्थ चली जाती हैं।
संग्रह की कहानी जश्न यूं तो है बहुत छोटी बमुश्किल 10-12 पंक्तियों की लेकिन सबसे दमदार। कहानी की शुरुआत मिल मजदूर करमु के पगार मिलने से होती है। पगार मिलने से करमु काफी खुश है और काफी दिनों बाद मछली खरीदकर लाया है। यह देखकर उसके बच्चे और पत्नी भी बल्ली उछल रहे हैं क्योंकि काफी दिनों बाद उन लोगों को मछली खाने को मिलेगी। मछली धोने के लिए वह नाले के पास जाता है ताकि उसके पड़ोसी देखकर यह समझ लें कि वह भी मछली खा सकता है। वह नाले के पास मछली धो रहा होता है कि एक कौवा थाली में चोंच मार
देता है जिस कारण मछलियों के टुकड़े नाले में बह जाते हैं। मछलियों का नाली में बह जाने से वह इतना गुस्सा हो जाता है कि चप्पल उठाकर कौवे को दे मारता है और कौवा वहीं फर्श पर गिर पर प्राण त्याग देता है। इसके बाद वह मरे हुए कौवे घर ले जाता है और उसी को पकाकर खा जाता है। कौवे का मांस खाते वक्त करमु को घृणा नहीं बल्कि तृप्ति होती है। कहानी में कौवा उन मिल मालिकों का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो मजदूरों का हक डकार जाते हैं। वहीं, करमु के रूप में देश का सर्वहारा वर्ग खड़ा है। कहानी के माध्यम से यह बताने की कोशिश की गयी है कि यदि मजदूरों को उनके हक से इसी तरह बेदखल किया जाता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देश के करमु इन धन्ना सेठों को कौवों जैसी स्थिति कर देंगे।
क्रेजी फैंटेसी की दुनिया संग्रह की एक कहानी उल्लेखनीय कहानी है। इसके बारे में यह दावा किया जा सकता है कि यह विश्व स्तर की किसी भी कहानी के टक्कर की है। इसकी शुरुआत जिस तरीके से की गयी है उससे यह विज्ञान कहानी प्रतीत होती है लेकिन ज्यों ज्यों कहानी आगे बढ़ती है इस पर से रहस्य की परत हटती जाती है और फिर पता चलता है कि कैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियां तीसरी दुनिया में अपने उत्पादों को बेचने के लिए बीमारियां फैला रही हैं और केन्द्र सरकार बजाय ठोस कदम उठाने के उन कंपनियों की पिछलग्गू बनी हुई है। इसमें उन अंतर्राष्ट्रीय साजिशों को भी बेनकाब किया गया है जो अमीर देश गरीब देशों के साथ करते हैं और उनका शोषण करके भी उन पर अपनी मेहरबानियां लादते दिखायी देते हैं। इस कहानी में तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के ताने-बाने को भी उजागर किया गया है।
कहानीकार चूंकि पत्रकारिता से जुड़े हैं इसीलिए उन्होंने पत्रकारिता की दुनिया पर भी एक कहानी लिखी है। 'सूखा सूखा कितना सूखा' कहानी के मार्फत पत्रकारिता की सफेद स्याह दुनिया का यथार्थ दिखाया गया है। कैसे एक अखबार अपना विक्रय बढ़ाने के लिए झूठी खबरों को सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करता है और किस तरह पत्रकार बनने की मनसा लेकर इस क्षेत्र में कूदे उत्साहित युवाओं का शोषण किया जाता है, यह सब इस कहानी में मौजूद है।
फूलबागान का सपना में एक मजदूर के जीवट की कहानी तो कहता ही है मौजूदा व्यवस्था में उसकी नियति को भी बयान करता है। औलाद कहानी मौजूदा दौर के लोगों को हृदयहीनता को व्यक्त करती है तो कुलटा और उसके बारे में आदि कहानियां स्त्री के दर्द और संघर्ष को व्यक्त करने में सक्षम हैं। कायाकल्प एक बच्ची के जीवन के बदलावों का विश्वस्त मनोवैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करती है। एक हिट भोजपुरी फिल्म का कहानी नौटंकी वालों से संघर्ष को भी व्यक्त करती है और उनके दमखम को भी। कुछ मिलाकर इन कहानियों से गुजरना समकालीन जीवन को एक नये संवेदनशील नजरिये से देखना और जानना है और बदलाव की एक बेचैनी को अपने मनोजगत में जगाना है क्योंकि जिस दुनिया से पाठक गुजरा है कुल मिलाकर एक बेचैन दुनिया है।
Sunday, 18 April 2010
जीवन संघर्ष और जिजीविषा की बेहतरीन कहानियां
-कमलेश पाण्डेय
कविता के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले महानगर के रचनाकार डॉ. अभिज्ञात का पहला कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' का सद्य: प्रकाशन शिल्पायन ने किया है। डॉ. अभिज्ञात के इस पहले कथा संग्रह में हंस, वसुधा, वर्तमान साहित्य, कादंबिनी, नया ज्ञानोदय जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपी उनकी कई कहानियों के साथ कई अप्रकाशित कहानियां संकलित हैं। देश के विभिन्न समाचारपत्रों में कार्यानुभव रखने वाले डॉ.अभिज्ञात की विशेषता है कि वे अपनी कहानियों में जीवन संघर्ष तथा पात्रों की जिजीविषा को कई बार सीधे-सीधे तो कई बार व्यंजना की शैली में प्रस्तुत करते हैं। उनकी कहानी 'कॉमरेड और चूहे' ऐसी ही एक कहानी है, जिसमें लोगों के हित का अंतिम क्षण तक स्वप्न देखने वाले एक कम्युनिस्ट का शव अपनी तमाम उदात्त भावना के बावजूद आखिरकार व्यवस्था का शिकार हो जाता है। उसके शव को समाज रूपी चूहा कुतर जाता है। ऐसा नहीं कि डॉ.अभिज्ञात की कहानियों में नैराश्य की ही प्रधानता है अथवा वे अपनी कहानियों के माध्यम से कोई प्रेरणा देते नहीं दिखते। इनकी कहानियों के पात्र अपनी स्थितियों में बदलाव लाने को प्रस्तुत हैं। 'एक हिट भोजपुरी फिल्म की स्टोरी' के पात्र विरासत में मिली अपनी परंपरा को जिलाये रखने की भावना के साथ-साथ आधुनिकता को भी अपनाने की पूरी जद्दोजहद में जुटे हैं तथा आखिरकार उन्हें अपने मकसद में कामयाबी हासिल होती है। एक ओर जहां डॉ.अभिज्ञात समाज की विभिन्न परिस्थितियों के कलात्मक विश्लेषण में जुटे हैं, वहीं पात्र दर पात्र वे मानव मन का विश्लेषण भी करते हैं। समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़े इनके पात्र अपने चरित्रों के अनुसार परिस्थितियों के अनुरूप आचरण करते हैं।
यह डॉ.अभिज्ञात की खासियत है कि वे पाठकों को विशेष तौर पर चौंकाते नहीं हैं बल्कि इनकी कहानियों में कथानक धीरे-धीरे स्वत: आगे बढ़ता है। हालांकि 'क्रेजी फैंटेसी की दुनिया' में डॉ.अभिज्ञात पाठकों के सामने एक ऐसा रचना संसार प्रस्तुत करते हैं, जिसमें प्रकृति के सानिध्य से रक्षा, विनाश की परिकल्पना के साथ-साथ मानवीय मूल्यों के क्षरण का लेखा-जोखा सा पाठकों के सामने मानो उपस्थित हो जाता है। इसी प्रकार इनकी 'तीसरी बीवी' शीर्षक कहानी भी व्यवस्था के कू्रर पंजे में जकड़े लोगों के मानवीय संवेदनाओं को उजागर करती है। डॉ.अभिज्ञात की कहानियां विशेष तौर पर व्यवस्था में जकड़े समाज के दबे कुचले लोगों के पक्ष में उनके जीवन संघर्ष की दास्तान हैं।
जीवनस्पर्श की कहानियां: तीसरी बीवी
-संजय कुमार सेठ/पुस्तक वार्ता ------------- हृदय’ और ‘बुद्धि’ के योग से संयुक्त ‘अभिज्ञात’ का ज्ञात मन सपने देखता है। ये सपने भी रो...
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समीक्षा सुधीर राघव ( हिन्दुस्तान, चंडीगढ़ 13 जून 2010 को प्रकाशित) अभिज्ञात अपनी बसाई दुनिया लेकर फिर पाठकों के सामने हाजिर हैं। यह दुनिया ह...
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तीसरी बीवी आनलाइन आर्डर दे मंगा सकते हैं।

