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Monday, 9 December 2019

जीवनस्पर्श की कहानियां: तीसरी बीवी


-संजय कुमार सेठ/पुस्तक वार्ता
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हृदय’ और ‘बुद्धि’ के योग से संयुक्त ‘अभिज्ञात’ का ज्ञात मन सपने देखता है। ये सपने भी रोचक, उत्तेजक, मारक और दिल दहला देने वाले हैं। यह लेखक का पहला कहानी-संग्रह है ‘तीसरी बीवी’ जिसमें कुल छोटी-बड़ी 25 कहानियां120 पृष्ठों में पसरी हुई हैं। यह संकलन रचनाकार की रचनादृष्टि को समझने का अवसर देती है। अपने सृजनकर्म में ‘अभिज्ञात’ बदलते हिंदुस्तान की धधकते-धड़कन को अपने पाठकों को सुनाते हैं। भारत का वही परिदृश्य नहीं रह गया जो 25-30 वर्ष पहले था। गांव, शहर, विकास, मूल्य, घूसखोरी, भ्रष्टाचार आदि की जटिलताओं में लगातार वृद्धि हुई है। ‘इण्डिया शाइनिंग’ की नई पीढ़ी हिंदुस्तान की खाती-पीती और अघाती संस्कृति को महत्त्व देती है।‘पहलवान का बेटा पहलवान’ नहीं होता विज्ञानकी इस ‘थ्योरी’ को उग्रपूंजीवाद ने नकार दिया है। वह लोगों को विज्ञापित कर-करके बताता है कि देखो! पूंजीपति का बेटा ही पूंजीपति होगा। इस नई पूंजीवाद के स्वार्थी रक्षक हैं कोड़ा, तेलगी, पं.सुखराम, पप्पू यादव और रामालिंगम् राजू जैसे लोग। यही लोग आधुनिक भारत के कर्णधार है। इन्हीं के दल-बल पर हिंदुस्तान की समेकित संस्कृति और गंवई सहजता नष्ट-भ्रष्ट हो रही है। भारत में एक दौर1960-70 का था, जिसमें राजनैतिक, सांस्कृतिक गतिविधियों एवं साहित्य के बल पर जन पक्षधरता की वकालत की जाती थी। इस युगबोध के लोग कमजोरों, गरीबों और उपेक्षितों की लड़ाई केलिए जीते-मरते थे। किंतु 1990 के बाद,मंडल, कमंडल और भूमंडलीकरण ने भारतीय जनमानस में ‘सपने’ देखने और दिखाने का जज़्बा पैदा किया। ‘एमएनसी’ बिल्कुल नई मल्टीनेशनल कंपनी के आने से रोजगार बढ़ा,लेकिन उस अनुपात में नहीं जिस अनुपात उसने लोगों को सपने दिखाए थे गरीबी मिटाने के। कार्पोरेट कृषि, मॉल्स, मैक्ड़ी और मेट्रो कल्चर ने इधर भारतीय सामाजिक संरचना में हलचल पैदा की। इस हलचल से भारत का मध्यवर्गीय समाज उद्वेलित हुआ लेकिन ‘हाशिये’ का सामाजिक जीवन स्थिर और ग़लीज है। भारतीय समाज का यह उत्पीड़ित समूह मौसम की मार से पस्त है और कु-विकासनीतियों से बेहाल है। इन्हीं परिवर्तनों को ‘अभिज्ञात’ चित्रों एवं संकेतों के माध्यम से अपने कथा का आधार बनाते हैं। वे अपनी कहानियों में दिखाते हैं कि ‘बंगाल’ कभी नवजागरण का प्रतीक था। रोजगार के वहां अकूत संसाधन थे। ‘मिले’ आधुनिक मंदिरनबी, इन्हीं मंदिरों से व्यापार के नए-नए ‘बिजनेस ताइकून’ पैदा हुए। किंतु एक आम भारतीय का जीवन नरक बन गया। इस संग्रह की बानगी कहानी ‘तीसरीबीवी’ है। इस कहानी के केंद्र में ‘औद्योगिक कचरे’ पर पलने वाला समाज का चित्राण है। कहानी में ‘बूढ़ा नूर’ और ‘हबीब’ का जीवन बद से बदत्तर है। तंगी और अभाव से नूर कराह रहा है। इसमें नूर की बेटी का आना‘कोढ़ में खाज’ जैसा है, जिसे उसका मरद मारकर मैके भेज देता है। नूर अपनी बेटी को स्वयं हबीब के घर पहुंचा देता है क्योंकि वह उसकी परिवरिश करने में अक्षम है। हबीब के पास पहले से दो पत्नियां मौजूद थीं। हबीब कचरे पर पलने वाले लोग के बीच साहूकार जैसा है, किंतु उसकी भी वास्तविक हालत खराब है। वह जेल में बंद है। उसकी नई बीवी घर में आ चुकी है। ‘अभिज्ञात’ इस भयावह स्थिति का वर्णन करते हैं। वे उसपरिवेश की दारूण दशा को उभारते हैं, जहां नूर और हबीबी जैसों का समाज पलता है। यथा ‘खांव-खांव खांसने की आवाज घर-घर से उठती थी तो अनवरत क्रम पाड़े के कोने-कोने की चीजों को उलट डालने को व्यग्र-सा जान पड़ता था। कच्ची भित्तियां कांपती-सी लगतीथीं और टुटहे नाममात्र के दरवाजों, खिड़कियों,छप्परों और दरकी दीवारों से हवा का ठंडापन उनकी नाक और सीने में गिजगिजे मोम-साव्याप्त था, जो खंखारने और नाक सुकड़ने की क्रिया को रसद पहुंचा रहा था।’’ (पृ. 38) लेखककी यही पैनी दृष्टि ‘उसकी गरीबी’ ‘फूलबागान का सपना’ जैसी कहानियों में भी दिखती है। यहां बल अभाव के दर्शन पर नहीं है, बल्कि‘उस ‘व्यवस्था’ पर है जिनसे ‘खड़दह’ जैसा परिवेश लगातार बन रहा है। यह एक वैचारिक प्रतिबद्ध शहर की कथा है। गरीबी की राजनीति करने वाले, ये छद्म मार्क्सवादी सोनागाछी, चिड़ियामोड़, फूलाबगान, टीटागढ़, खड़दह जैसे मुहल्ले बसाते हैं। रचनाकार कविता के ढब पर लघुकथाएं रचता है। ये कथाएं गंभीर घाव करती हैं। इनका गठन संक्षिप्त है लेकिनउसकी मारक क्षमता तिलमिलाने वाली है।इस दृष्टि से ‘जश्न’, ‘मुक्ति’, ‘बंटवारे’,‘तरकीब’, ‘साख की कीमत’, ‘शिनाख्त नहीं’,‘कितना खराब’, जैसी कहानियां प्रमुख हैं। लघुकथा ‘तरकीब’ गांव के विद्वान पंडितों परकेन्द्रित है। समय के प्रवाह में ब्राह्मण गरीब होते हैं किंतु अपनी ‘कूटभाषा’ के बल परपुनः अमीर होकर समाज में अपनी प्रभुता स्थापित करते हैं। लेखक बताता है कि आज भी हिंदुस्तान में यह संप्रभु वर्ग अपनी कुशल ‘सामाजिक ताकत’ और ‘कूटनीति’ के दमपर समाज में सबका ‘पूज्य’ बना हुआ है।बहुतों के लिए आज भी गांव, गरीबी और पिछड़ेपन का पर्याय है। अभिज्ञात इस धारणा को तोड़ते हैं। वे गांव की सहजता, तिकड़म,जीवतंता और कलाप्रियता को उजागर करते हैं। ग्रामीण अंचल पर केंद्रित ‘तोहफा’,‘पड़ोसन’, ‘मुन्नीबाई’ बेजोड़ कहानी है। क्रमशःरोजगार के संसाधन शहर केंद्रित हो रहे हैं। ऐसे में गांव केवल स्मृतियों में है या तो‘पिकनीक स्पॉट’ के रूप में। ‘मुन्नीमाई’ की ‘कहाइन’ ठाकुरों के घरों में राज करती है।गर्मी के दिनों में मुन्नीबाई की पूछ बढ़ जाती है। मुन्नी पर ‘कब्जा पाने की परिवारों में होड़ सी रहती’ (पृ. 117) है। पूरे ठाकुर घराने में मुन्नीबाई की ठसक है। वह नखरे करती है, और अपनी देह दबवाती है, तथा उनकी नमकीन,बिस्कुट भी खाती है। अपने ‘हाड़तोड़ जांगर’के बल पर। शहराती बहू-बेटियों को आराम चाहिए और काम करने वाली गांव में बाई केवल मुन्नी है। गांव में मुन्नी के किस्से बहुत हैं। इसकी दरियादिली और कलाप्रियता का पता तब चलता है, जब कलाकार बहू वापस शहर जाने लगती है। मुन्नी पैसे न लेकर बदले में ‘एक खूबसूरत शाल गायिका बहू की तरफ बढ़ा दिया ‘भगवान तुम्हें तरक्की दे।मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है बहू। फूलो-फलो। फिर जल्द आना तुम्हारा इंतजार रहेगा।’ (पृ.120)। यह है अनपढ़, गवई बाई की कलाकार बहू को दिया गया प्यार, सम्मान और विदाई। इस प्रकरण पर गांव के कई लोगों की आंखें नम होती हैं। यह कहानी गांवों की रागात्मक संबंधों की तासीर को जिंदा रखती है। आधुनिक व्यक्ति जटिलताओं का पुंजहै। बाजार, मीडिया और तकनीकी क्रांति ने मानव जीवन को एकतरफ सुविधाभोगी बनाया तो, वहीं दूसरी ओर वह मनुष्य को आत्मकेंद्रित,स्वार्थी, दंभी और लूटेरा बना दिया है। मानव की स्वाभाविक गतिशीलता का क्षरण हो रहा है।व्यक्ति मनुष्यता का धर्म खोकर प्रतियोगी बनगया है। ऐसे में पारिवारिक संबंधों की जटिलताएंभी बढ़ी हैं। नई-पीढ़ी व पुरानी पीढ़ी में द्वंद्व,दाम्पत्य जीवन का उदासीपन, बच्चों का भावनात्मक रूप से कमजोर होना, प्यार जैसे सार्वभौमिक मूल्य ‘अर्थ’ के अनर्थ में बदल गएहैं। जाति की जकड़न ढीले और कड़े हुए हैं।लेखक इन सभी जटिलताओं को कथा बनाता है। इस दृष्टि से देखें तो ‘कायाकल्प’, ‘कुलटा’,‘शिनाख्त नहीं’, ‘फिर मुठभेड़’, ‘उसके बारे में’‘कपड़ों में बसी याद’ इत्यादि उत्कृष्ट कहानियां हैं। ‘औलाद’ कहानी की मां अपने कैरियर के लिए अपने नवजात शिशु की हत्या चाहती है क्योंकि वह मानती है ‘मैंने इसे मजबूरी में जन्म दिया है महज अपनी जान बचाने के लिए। मैं अपने प्रेमी को खो चुकी हूं। अब नौकरी से हाथ नहीं धोना चाहती और ना ही लोगों के तानेसुनने के लिए तैयार हूं। मैं इस बच्चे से छुटकारा पाना चाहती हूं।’ (पृ. 13)। यह कथा एयर हॉस्टेस नायिका की है, साथ ही एक संवेदनशील डॉ. नरेश की भी है। डॉ. नरेश बच्चेको बचाना चाहता है किन्तु ‘नर्सिंग होम’ का मालिक पैसों के दबाव में बच्चे को अन्य डॉ. से खत्म करवा देता है। बच्चे के खात्मा सेनिःसंतान दम्पति उदास हैं तो नरेश का शरीर प्राणशून्य है। ‘कैरियर’ और अकूत ‘धन’ की हवस ने आधुनिक मनुष्य का जीवन नरक बना दिया है। अभिज्ञात बार-बार अपने कहानी में इसी कोण को उठाते हैं। इस कृतिकार की भाषिक संरचना में नयापन है। छोटे-छोटे वाक्य विन्यास औरनपे-तुले शब्दों का चयन ‘कथ्य’ की आक्रामकता को बढ़ाते हैं। कहानी संकेतों, बिंबों, प्रतीकों में धीरे-धीरे आकार लेती है। कहानी में युगबोध ही‘नायक’ है। लेखक अपने कहानीपन के लिए अंग्रेजी, अरबी, हिंदी, बांग्ला, देशज शब्दों का घाल-मेल करता है। कहा इन, अहिराने, बाई,पाडे, मठ, गदही, पट्टे, कमरेडवा, भड़भुजापन,गोंजने, बचवा इत्यादि बंगाली और भोजपुरी मिश्रित शब्द-संतुलन से लेखक का यथार्थ-बोध कहीं खंडित नहीं होता है। ‘अभिज्ञात’ ‘फ्लैशबैक टेकनीक’ का उपयोग अपनी कहानियों में अधिकांशतः करते हैं। कहानी के बीच-बीच में संकेत, सामासिकता, गवेषणा, वर्णन शैलियों का बखूबी उपयोग हुआ है। इन शैलियों के कारण कहानी में ‘बहु-आयामिता’ और ‘अर्थ-सघनता’ बढ़ जाती है। प्रकृति और मनुष्य केबीच साहचर्य आवश्यक है। इनके न होने से पर्यावरण संकट गहरा सकता है। इस संकट की भाषिक व्यंजना की एक रवानगी देखिए-‘कछुओंके साथ उनका संबंध इतना प्रगाढ़ होता गया कि वे उनकी भाषा किसी हद तक समझने में कामयाब होने लगे थे। यह साढ़े चार सौ साल की उम्र का कछुआ था। वह उनसे मदद मांग रहा था। उसका कहना था कि समुद्र में तेल निकालने के जो प्रयास किए जा रहे थे उससे समुद्र की भारी क्षति होने जा रही है। समुद्र के पास अथाह संपदा है किंतु उसे प्राप्त करने केतरीके मनुष्य ने नहीं सीखे हैं। उन्हें सीखना होगा। जिस प्रकार से तेल निकालने के प्रयास किए जा रहे हैं स्वयं कछुए की जाति भी खतरेमें पड़ने जा रही है और मछली सहित अन्यजीवन भी, जो समुद्र में रहते हैं। (पृ. 60-65)बढ़ी हो सकती है? यह ‘अभिज्ञात’ ही जाने।इन कथाओं के कुछ बिंदु ऐसे थे, जो कथानक में विस्तार पाते तो उसकी वेदना पाठकों को और झकझोरती। लेखक की ‘स्त्राी विषयक दृष्टि ’पुरुष के नजरिए से देखा गया है। ‘प्यार’ का प्रसंग अब एकात्मक नहीं है। अब ग्रामीण अंचल ही स्त्रिायां भी मुखर होने लगी हैं। फिरभी ‘अभिज्ञात’ की कहानियां अपने समय केसच को परत-दर-परत खोलती हैं और सच्चाई उनके लिए अखजत की गई सी नहीं है बल्कि वह सहसा जहां-तहां से निकलकर पाठक के सामने आती है। कई बार वह अपनी बेलौस भंगिमा के कारण हकाबका देती है तो कई बार वह मर्म को बेधती है, शर्मसार करती है, हूक पैदा करती हैऔर कई बार ढाढस भी बंधाती है कि सब कुछ नष्ट नहीं हुआ है।’ (फ्लैप से उद्धृत)।
तीसरी बीवी/ अभिज्ञात/ शिल्पायन/ 10295, लेननं. 1, वैस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली-110032/ृ150द्वारा विक्की शर्मा, 38/5, शक्ति नगर,दिल्ली-110007, मो. 9868056118

Sunday, 18 April 2010

जीवन संघर्ष और जिजीविषा की बेहतरीन कहानियां

समीक्षा
-कमलेश पाण्डेय
कविता के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले महानगर के रचनाकार डॉ. अभिज्ञात का पहला कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' का सद्य: प्रकाशन शिल्पायन ने किया है। डॉ. अभिज्ञात के इस पहले कथा संग्रह में हंस, वसुधा, वर्तमान साहित्य, कादंबिनी, नया ज्ञानोदय जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपी उनकी कई कहानियों के साथ कई अप्रकाशित कहानियां संकलित हैं। देश के विभिन्न समाचारपत्रों में कार्यानुभव रखने वाले डॉ.अभिज्ञात की विशेषता है कि वे अपनी कहानियों में जीवन संघर्ष तथा पात्रों की जिजीविषा को कई बार सीधे-सीधे तो कई बार व्यंजना की शैली में प्रस्तुत करते हैं। उनकी कहानी 'कॉमरेड और चूहे' ऐसी ही एक कहानी है, जिसमें लोगों के हित का अंतिम क्षण तक स्वप्न देखने वाले एक कम्युनिस्ट का शव अपनी तमाम उदात्त भावना के बावजूद आखिरकार व्यवस्था का शिकार हो जाता है। उसके शव को समाज रूपी चूहा कुतर जाता है। ऐसा नहीं कि डॉ.अभिज्ञात की कहानियों में नैराश्य की ही प्रधानता है अथवा वे अपनी कहानियों के माध्यम से कोई प्रेरणा देते नहीं दिखते। इनकी कहानियों के पात्र अपनी स्थितियों में बदलाव लाने को प्रस्तुत हैं। 'एक हिट भोजपुरी फिल्म की स्टोरी' के पात्र विरासत में मिली अपनी परंपरा को जिलाये रखने की भावना के साथ-साथ आधुनिकता को भी अपनाने की पूरी जद्दोजहद में जुटे हैं तथा आखिरकार उन्हें अपने मकसद में कामयाबी हासिल होती है। एक ओर जहां डॉ.अभिज्ञात समाज की विभिन्न परिस्थितियों के कलात्मक विश्लेषण में जुटे हैं, वहीं पात्र दर पात्र वे मानव मन का विश्लेषण भी करते हैं। समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़े इनके पात्र अपने चरित्रों के अनुसार परिस्थितियों के अनुरूप आचरण करते हैं।
यह डॉ.अभिज्ञात की खासियत है कि वे पाठकों को विशेष तौर पर चौंकाते नहीं हैं बल्कि इनकी कहानियों में कथानक धीरे-धीरे स्वत: आगे बढ़ता है। हालांकि 'क्रेजी फैंटेसी की दुनिया' में डॉ.अभिज्ञात पाठकों के सामने एक ऐसा रचना संसार प्रस्तुत करते हैं, जिसमें प्रकृति के सानिध्य से रक्षा, विनाश की परिकल्पना के साथ-साथ मानवीय मूल्यों के क्षरण का लेखा-जोखा सा पाठकों के सामने मानो उपस्थित हो जाता है। इसी प्रकार इनकी 'तीसरी बीवी' शीर्षक कहानी भी व्यवस्था के कू्रर पंजे में जकड़े लोगों के मानवीय संवेदनाओं को उजागर करती है। डॉ.अभिज्ञात की कहानियां विशेष तौर पर व्यवस्था में जकड़े समाज के दबे कुचले लोगों के पक्ष में उनके जीवन संघर्ष की दास्तान हैं।

अभिज्ञात के कहानी संग्रह तीसरी बीवी की समीक्षा







Saturday, 17 April 2010

सामाजिक विसंगतियों का आख्यान

समीक्षा
-लोकेन्द्र बहुगुणा
अभिज्ञात के सद्य प्रकाशित कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' में संकलित कहानियां वर्तमान समाज के जीवन मूल्यों, सपनों और विसंगतियों की जोर आजमाइश का आख्यान हैं। अभिज्ञात ने अपने आसपास घट रही रोजमर्रा की घटनाओं को अलग-अलग नजरिये से अपनी कहानियों में चित्रित किया है।
संग्रह में विभिन्न समय पर लिखी गयी 25 छोटी-बड़ी कहानियां हैं, जिनमें कई विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुई हैं। समाज में हो रहे बदलाव पर लेखक की पैनी नजर है और उसे वे जहां-तहां से निकाल कर पाठक के सामने लाते हैं? किस्सागोई के हिसाब से वे कहानियां पाठक को ज्यादा आकर्षित करती हैं जो आत्म कथ्यामक या संस्मरणात्मक अंदाज में लिखी गयी हैं लेकिन कई कहानियों में सशक्त विषय- वस्तु के बावजूद सपाटबयानी है लेकिन इन सीमाओं के बावजूद इसमें दो राय नहीं कि कहानियां सामाजिक सरोकार के वे सवाल छोड़ जाती हैं जिनसे बचने की कोशिश तमाम दावों के बावजूद जारी है।
संग्रह की सबसे लंबी कहानी 'क्रेज़ी फैंटेसी की दुनिया' और सबसे छोटी 'बंटवारे' हैं जो अपने अपने ढंग से आज के 'सच' को सामने लाती है। कथ्य और शिल्प की दृष्टि से 'क्रेज़ी फैंटेसी की दुनिया' को अगर संग्रह की सबसे बेहतर कहानी कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। व्यवस्था की हकीकत को कहानी के जरिये जिस तरह पेश किया गया है वह काबिलेगौर है। कहानी का नायक एक वैज्ञानिक है, जो पारिवारिक एवं सामाजिक जिम्मेवारियों से उदासीन अन्वेषण की अपनी दुनिया में मस्त रहता है। उसे अपने पारिवारिक दायित्वों का तब बोध होता है जब उसकी पत्नी का देहांत हो जाता है और एकमात्र संतान पुत्री की देखभाल में उसे माता और पिता दोनों की भूमिका निभानी पड़ती है। पुत्री को मां की कमी और अकेलापन न खले इसके लिए वह कहानियां गढ़ने लगता है और धीरे-धीरे उसे भी इस लेखन में मजा आने लगता है। ऐसे ही एक प्रयास में वह एक अजीबोगरीब चरित्र की कल्पना करता है। वह अपनी कहानियों में क्रैजी फैटेंसी नाम के एक खास चरित्र गढ़ता है जो मन चाही शक्ल अख्तियार करने में माहिर है। उसकी ये कहानियां और पात्र क्रैजी फैंटेसी पाठकों द्वारा इस कदर पसंद किये जाते हैं कि वे इस कल्पना को हकीकत मानने लगते हैं। ऐसे वक्त में मुल्क में एक अजीब तरह की बीमारी फैलती है और लोग इसकी वजह क्रैजी फैंटेसी को बताने लगते हैं। पता चलता है कि यह बीमारी एक खास तरह के विषाणु से फैलती है और यह विषाणु किसी विकसित मुल्क की देन है। इस फैंटेसी के जरिये आधुनिक समाज व तंत्र की विसंगतियों को दिलचस्प अंदाज में उजागर करने की कोशिश की गयी है। वास्तविकता और कल्पना की यह मिलावट अपने निहितार्थ के कारण आधुनिक समाज की आशा-आशंकाओं और संभावनाओं के व्यापक विस्तार का परिचय देती है। दरअसल कुछ समय पहले जब पहले बर्ड फ्लू और बाद में स्वाइन फ्लू( जिसका असर मुल्क में अब भी बरकरार है ) के बारे में वैश्विक स्तर पर सूचनाओं के आदान- प्रदान और जन जागरण की मुहिम के दौरान समाज के विभिन्न स्तरों पर इस तरह के सवाल उठे थे। वैज्ञानिक गतिविधियों और प्रशासनिक व्यवस्था से जड़े लोगों में यह सवाल भी उठा था कि क्या इस तरह की 'महामारियों'के बारे में लोगों को जागरूक बनाने की जगह आतंकित तो नहीं किया जा रहा है।
संग्रह की 'तीसरी बीवी','फूलबागान का सपना'और 'जश्न' जैसी लघु कहानियां रोजी-रोटी के अवसरों की दृष्टि से सिमटते गाँव फैलते शहरों के अंधेरे पक्ष के कटु सत्य को सामने रखती है। लिहाजा वे पाठक के मर्म को बेधती हैं। हालांकि ये कहानियां कोलकाता महानगर और उसके आसपास के परिवेश में केंद्रित हैं लेकिन ये दृश्य मुंबई, दिल्ली या ऐसे ही किसी महानगर के परिवेश की भी हो सकती क्योंकि कमोबेश कारक और हालात सभी जगह एक से हैं। हालांकि 'एक हिट भोजपुरी फिल्म की स्टोरी' जैसी कहानियों के जरिये यह अहसास कराने की कोशिश भी की गयी है कि सब कुछ नष्ट नहीं हुआ है, बेहतरी की संभावनाएं एकदम खत्म नहीं हुई हैं।
पुस्तक : तीसरी बीवी
लेखक : अभिज्ञात
प्रकाशक : शिल्पायन, दिल्ली
मूल्य : 150 रुपये
पृष्ट : 120

जीवनस्पर्श की कहानियां: तीसरी बीवी

-संजय कुमार सेठ/पुस्तक वार्ता ------------- हृदय’ और ‘बुद्धि’ के योग से संयुक्त ‘अभिज्ञात’ का ज्ञात मन सपने देखता है। ये सपने भी रो...