Monday, 9 December 2019

जीवनस्पर्श की कहानियां: तीसरी बीवी


-संजय कुमार सेठ/पुस्तक वार्ता
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हृदय’ और ‘बुद्धि’ के योग से संयुक्त ‘अभिज्ञात’ का ज्ञात मन सपने देखता है। ये सपने भी रोचक, उत्तेजक, मारक और दिल दहला देने वाले हैं। यह लेखक का पहला कहानी-संग्रह है ‘तीसरी बीवी’ जिसमें कुल छोटी-बड़ी 25 कहानियां120 पृष्ठों में पसरी हुई हैं। यह संकलन रचनाकार की रचनादृष्टि को समझने का अवसर देती है। अपने सृजनकर्म में ‘अभिज्ञात’ बदलते हिंदुस्तान की धधकते-धड़कन को अपने पाठकों को सुनाते हैं। भारत का वही परिदृश्य नहीं रह गया जो 25-30 वर्ष पहले था। गांव, शहर, विकास, मूल्य, घूसखोरी, भ्रष्टाचार आदि की जटिलताओं में लगातार वृद्धि हुई है। ‘इण्डिया शाइनिंग’ की नई पीढ़ी हिंदुस्तान की खाती-पीती और अघाती संस्कृति को महत्त्व देती है।‘पहलवान का बेटा पहलवान’ नहीं होता विज्ञानकी इस ‘थ्योरी’ को उग्रपूंजीवाद ने नकार दिया है। वह लोगों को विज्ञापित कर-करके बताता है कि देखो! पूंजीपति का बेटा ही पूंजीपति होगा। इस नई पूंजीवाद के स्वार्थी रक्षक हैं कोड़ा, तेलगी, पं.सुखराम, पप्पू यादव और रामालिंगम् राजू जैसे लोग। यही लोग आधुनिक भारत के कर्णधार है। इन्हीं के दल-बल पर हिंदुस्तान की समेकित संस्कृति और गंवई सहजता नष्ट-भ्रष्ट हो रही है। भारत में एक दौर1960-70 का था, जिसमें राजनैतिक, सांस्कृतिक गतिविधियों एवं साहित्य के बल पर जन पक्षधरता की वकालत की जाती थी। इस युगबोध के लोग कमजोरों, गरीबों और उपेक्षितों की लड़ाई केलिए जीते-मरते थे। किंतु 1990 के बाद,मंडल, कमंडल और भूमंडलीकरण ने भारतीय जनमानस में ‘सपने’ देखने और दिखाने का जज़्बा पैदा किया। ‘एमएनसी’ बिल्कुल नई मल्टीनेशनल कंपनी के आने से रोजगार बढ़ा,लेकिन उस अनुपात में नहीं जिस अनुपात उसने लोगों को सपने दिखाए थे गरीबी मिटाने के। कार्पोरेट कृषि, मॉल्स, मैक्ड़ी और मेट्रो कल्चर ने इधर भारतीय सामाजिक संरचना में हलचल पैदा की। इस हलचल से भारत का मध्यवर्गीय समाज उद्वेलित हुआ लेकिन ‘हाशिये’ का सामाजिक जीवन स्थिर और ग़लीज है। भारतीय समाज का यह उत्पीड़ित समूह मौसम की मार से पस्त है और कु-विकासनीतियों से बेहाल है। इन्हीं परिवर्तनों को ‘अभिज्ञात’ चित्रों एवं संकेतों के माध्यम से अपने कथा का आधार बनाते हैं। वे अपनी कहानियों में दिखाते हैं कि ‘बंगाल’ कभी नवजागरण का प्रतीक था। रोजगार के वहां अकूत संसाधन थे। ‘मिले’ आधुनिक मंदिरनबी, इन्हीं मंदिरों से व्यापार के नए-नए ‘बिजनेस ताइकून’ पैदा हुए। किंतु एक आम भारतीय का जीवन नरक बन गया। इस संग्रह की बानगी कहानी ‘तीसरीबीवी’ है। इस कहानी के केंद्र में ‘औद्योगिक कचरे’ पर पलने वाला समाज का चित्राण है। कहानी में ‘बूढ़ा नूर’ और ‘हबीब’ का जीवन बद से बदत्तर है। तंगी और अभाव से नूर कराह रहा है। इसमें नूर की बेटी का आना‘कोढ़ में खाज’ जैसा है, जिसे उसका मरद मारकर मैके भेज देता है। नूर अपनी बेटी को स्वयं हबीब के घर पहुंचा देता है क्योंकि वह उसकी परिवरिश करने में अक्षम है। हबीब के पास पहले से दो पत्नियां मौजूद थीं। हबीब कचरे पर पलने वाले लोग के बीच साहूकार जैसा है, किंतु उसकी भी वास्तविक हालत खराब है। वह जेल में बंद है। उसकी नई बीवी घर में आ चुकी है। ‘अभिज्ञात’ इस भयावह स्थिति का वर्णन करते हैं। वे उसपरिवेश की दारूण दशा को उभारते हैं, जहां नूर और हबीबी जैसों का समाज पलता है। यथा ‘खांव-खांव खांसने की आवाज घर-घर से उठती थी तो अनवरत क्रम पाड़े के कोने-कोने की चीजों को उलट डालने को व्यग्र-सा जान पड़ता था। कच्ची भित्तियां कांपती-सी लगतीथीं और टुटहे नाममात्र के दरवाजों, खिड़कियों,छप्परों और दरकी दीवारों से हवा का ठंडापन उनकी नाक और सीने में गिजगिजे मोम-साव्याप्त था, जो खंखारने और नाक सुकड़ने की क्रिया को रसद पहुंचा रहा था।’’ (पृ. 38) लेखककी यही पैनी दृष्टि ‘उसकी गरीबी’ ‘फूलबागान का सपना’ जैसी कहानियों में भी दिखती है। यहां बल अभाव के दर्शन पर नहीं है, बल्कि‘उस ‘व्यवस्था’ पर है जिनसे ‘खड़दह’ जैसा परिवेश लगातार बन रहा है। यह एक वैचारिक प्रतिबद्ध शहर की कथा है। गरीबी की राजनीति करने वाले, ये छद्म मार्क्सवादी सोनागाछी, चिड़ियामोड़, फूलाबगान, टीटागढ़, खड़दह जैसे मुहल्ले बसाते हैं। रचनाकार कविता के ढब पर लघुकथाएं रचता है। ये कथाएं गंभीर घाव करती हैं। इनका गठन संक्षिप्त है लेकिनउसकी मारक क्षमता तिलमिलाने वाली है।इस दृष्टि से ‘जश्न’, ‘मुक्ति’, ‘बंटवारे’,‘तरकीब’, ‘साख की कीमत’, ‘शिनाख्त नहीं’,‘कितना खराब’, जैसी कहानियां प्रमुख हैं। लघुकथा ‘तरकीब’ गांव के विद्वान पंडितों परकेन्द्रित है। समय के प्रवाह में ब्राह्मण गरीब होते हैं किंतु अपनी ‘कूटभाषा’ के बल परपुनः अमीर होकर समाज में अपनी प्रभुता स्थापित करते हैं। लेखक बताता है कि आज भी हिंदुस्तान में यह संप्रभु वर्ग अपनी कुशल ‘सामाजिक ताकत’ और ‘कूटनीति’ के दमपर समाज में सबका ‘पूज्य’ बना हुआ है।बहुतों के लिए आज भी गांव, गरीबी और पिछड़ेपन का पर्याय है। अभिज्ञात इस धारणा को तोड़ते हैं। वे गांव की सहजता, तिकड़म,जीवतंता और कलाप्रियता को उजागर करते हैं। ग्रामीण अंचल पर केंद्रित ‘तोहफा’,‘पड़ोसन’, ‘मुन्नीबाई’ बेजोड़ कहानी है। क्रमशःरोजगार के संसाधन शहर केंद्रित हो रहे हैं। ऐसे में गांव केवल स्मृतियों में है या तो‘पिकनीक स्पॉट’ के रूप में। ‘मुन्नीमाई’ की ‘कहाइन’ ठाकुरों के घरों में राज करती है।गर्मी के दिनों में मुन्नीबाई की पूछ बढ़ जाती है। मुन्नी पर ‘कब्जा पाने की परिवारों में होड़ सी रहती’ (पृ. 117) है। पूरे ठाकुर घराने में मुन्नीबाई की ठसक है। वह नखरे करती है, और अपनी देह दबवाती है, तथा उनकी नमकीन,बिस्कुट भी खाती है। अपने ‘हाड़तोड़ जांगर’के बल पर। शहराती बहू-बेटियों को आराम चाहिए और काम करने वाली गांव में बाई केवल मुन्नी है। गांव में मुन्नी के किस्से बहुत हैं। इसकी दरियादिली और कलाप्रियता का पता तब चलता है, जब कलाकार बहू वापस शहर जाने लगती है। मुन्नी पैसे न लेकर बदले में ‘एक खूबसूरत शाल गायिका बहू की तरफ बढ़ा दिया ‘भगवान तुम्हें तरक्की दे।मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है बहू। फूलो-फलो। फिर जल्द आना तुम्हारा इंतजार रहेगा।’ (पृ.120)। यह है अनपढ़, गवई बाई की कलाकार बहू को दिया गया प्यार, सम्मान और विदाई। इस प्रकरण पर गांव के कई लोगों की आंखें नम होती हैं। यह कहानी गांवों की रागात्मक संबंधों की तासीर को जिंदा रखती है। आधुनिक व्यक्ति जटिलताओं का पुंजहै। बाजार, मीडिया और तकनीकी क्रांति ने मानव जीवन को एकतरफ सुविधाभोगी बनाया तो, वहीं दूसरी ओर वह मनुष्य को आत्मकेंद्रित,स्वार्थी, दंभी और लूटेरा बना दिया है। मानव की स्वाभाविक गतिशीलता का क्षरण हो रहा है।व्यक्ति मनुष्यता का धर्म खोकर प्रतियोगी बनगया है। ऐसे में पारिवारिक संबंधों की जटिलताएंभी बढ़ी हैं। नई-पीढ़ी व पुरानी पीढ़ी में द्वंद्व,दाम्पत्य जीवन का उदासीपन, बच्चों का भावनात्मक रूप से कमजोर होना, प्यार जैसे सार्वभौमिक मूल्य ‘अर्थ’ के अनर्थ में बदल गएहैं। जाति की जकड़न ढीले और कड़े हुए हैं।लेखक इन सभी जटिलताओं को कथा बनाता है। इस दृष्टि से देखें तो ‘कायाकल्प’, ‘कुलटा’,‘शिनाख्त नहीं’, ‘फिर मुठभेड़’, ‘उसके बारे में’‘कपड़ों में बसी याद’ इत्यादि उत्कृष्ट कहानियां हैं। ‘औलाद’ कहानी की मां अपने कैरियर के लिए अपने नवजात शिशु की हत्या चाहती है क्योंकि वह मानती है ‘मैंने इसे मजबूरी में जन्म दिया है महज अपनी जान बचाने के लिए। मैं अपने प्रेमी को खो चुकी हूं। अब नौकरी से हाथ नहीं धोना चाहती और ना ही लोगों के तानेसुनने के लिए तैयार हूं। मैं इस बच्चे से छुटकारा पाना चाहती हूं।’ (पृ. 13)। यह कथा एयर हॉस्टेस नायिका की है, साथ ही एक संवेदनशील डॉ. नरेश की भी है। डॉ. नरेश बच्चेको बचाना चाहता है किन्तु ‘नर्सिंग होम’ का मालिक पैसों के दबाव में बच्चे को अन्य डॉ. से खत्म करवा देता है। बच्चे के खात्मा सेनिःसंतान दम्पति उदास हैं तो नरेश का शरीर प्राणशून्य है। ‘कैरियर’ और अकूत ‘धन’ की हवस ने आधुनिक मनुष्य का जीवन नरक बना दिया है। अभिज्ञात बार-बार अपने कहानी में इसी कोण को उठाते हैं। इस कृतिकार की भाषिक संरचना में नयापन है। छोटे-छोटे वाक्य विन्यास औरनपे-तुले शब्दों का चयन ‘कथ्य’ की आक्रामकता को बढ़ाते हैं। कहानी संकेतों, बिंबों, प्रतीकों में धीरे-धीरे आकार लेती है। कहानी में युगबोध ही‘नायक’ है। लेखक अपने कहानीपन के लिए अंग्रेजी, अरबी, हिंदी, बांग्ला, देशज शब्दों का घाल-मेल करता है। कहा इन, अहिराने, बाई,पाडे, मठ, गदही, पट्टे, कमरेडवा, भड़भुजापन,गोंजने, बचवा इत्यादि बंगाली और भोजपुरी मिश्रित शब्द-संतुलन से लेखक का यथार्थ-बोध कहीं खंडित नहीं होता है। ‘अभिज्ञात’ ‘फ्लैशबैक टेकनीक’ का उपयोग अपनी कहानियों में अधिकांशतः करते हैं। कहानी के बीच-बीच में संकेत, सामासिकता, गवेषणा, वर्णन शैलियों का बखूबी उपयोग हुआ है। इन शैलियों के कारण कहानी में ‘बहु-आयामिता’ और ‘अर्थ-सघनता’ बढ़ जाती है। प्रकृति और मनुष्य केबीच साहचर्य आवश्यक है। इनके न होने से पर्यावरण संकट गहरा सकता है। इस संकट की भाषिक व्यंजना की एक रवानगी देखिए-‘कछुओंके साथ उनका संबंध इतना प्रगाढ़ होता गया कि वे उनकी भाषा किसी हद तक समझने में कामयाब होने लगे थे। यह साढ़े चार सौ साल की उम्र का कछुआ था। वह उनसे मदद मांग रहा था। उसका कहना था कि समुद्र में तेल निकालने के जो प्रयास किए जा रहे थे उससे समुद्र की भारी क्षति होने जा रही है। समुद्र के पास अथाह संपदा है किंतु उसे प्राप्त करने केतरीके मनुष्य ने नहीं सीखे हैं। उन्हें सीखना होगा। जिस प्रकार से तेल निकालने के प्रयास किए जा रहे हैं स्वयं कछुए की जाति भी खतरेमें पड़ने जा रही है और मछली सहित अन्यजीवन भी, जो समुद्र में रहते हैं। (पृ. 60-65)बढ़ी हो सकती है? यह ‘अभिज्ञात’ ही जाने।इन कथाओं के कुछ बिंदु ऐसे थे, जो कथानक में विस्तार पाते तो उसकी वेदना पाठकों को और झकझोरती। लेखक की ‘स्त्राी विषयक दृष्टि ’पुरुष के नजरिए से देखा गया है। ‘प्यार’ का प्रसंग अब एकात्मक नहीं है। अब ग्रामीण अंचल ही स्त्रिायां भी मुखर होने लगी हैं। फिरभी ‘अभिज्ञात’ की कहानियां अपने समय केसच को परत-दर-परत खोलती हैं और सच्चाई उनके लिए अखजत की गई सी नहीं है बल्कि वह सहसा जहां-तहां से निकलकर पाठक के सामने आती है। कई बार वह अपनी बेलौस भंगिमा के कारण हकाबका देती है तो कई बार वह मर्म को बेधती है, शर्मसार करती है, हूक पैदा करती हैऔर कई बार ढाढस भी बंधाती है कि सब कुछ नष्ट नहीं हुआ है।’ (फ्लैप से उद्धृत)।
तीसरी बीवी/ अभिज्ञात/ शिल्पायन/ 10295, लेननं. 1, वैस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली-110032/ृ150द्वारा विक्की शर्मा, 38/5, शक्ति नगर,दिल्ली-110007, मो. 9868056118

Wednesday, 20 April 2011

दिल्ली में दलाली हो सकती है, साहित्य चर्चा नहीं

साभार-दैनिक जागरण
Apr 08, २०१०-03:00 am
कोलकाता। वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यिक पत्रिका हंस के कार्यकारी संपादक संजीव ने कहा कि दिल्ली में दलाली हो सकती है लेकिन साहित्य चर्चा की गुंजाइश नहीं है। दिल्ली की संवेदना सूख चुकी है। ऐसे माहौल में चौधराहट तो संभव है लेकिन साहित्य की संभावना नहीं रहती है। साहित्य के लिए संवदेना की जरूरत है और दिल्ली में इसकी भारी कमी है। यदि बंगाल में उन्हें अवकाश के बाद आठ हजार रुपये की नौकरी मिल जाती तो कभी दिल्ली की ओर रुख नहीं करते। संजीव भारतीय भाषा परिषद की ओर से आयोजित लेखक से मिलिये कार्यक्रम में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि हिन्दी साहित्य का आज यह दुर्भाग्य है कि जितने लेखक हैं उतने पाठक हैं। वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह कविता के आलोचक हैं और कहानी और उपन्यास पर टिप्पणी कर रहे हैं। राजेन्द्र यादव लेखन में सेक्स ढूंढ रहे हैं। उन्होंने कहा कि साहित्य की अपनी शर्त है और जब तक लेखक उसे पूरा नहीं करता है तब तक आम पाठक के लिए संप्रेषण मुश्किल है। उन्होंने अपनी रचना प्रक्रिया पर कहा कि मेरी शुरू से शोध कर लिखने की आदत रही है। जब तक लेखक द्वंद्व के नये क्षेत्रों का अन्वेषण नहीं करेगा तब तब धारण स्पष्ट नहीं होगी। रुस के मैक्सिम गोर्की उनके पसंदीदा लेखक हैं। और उनकी सबसे बड़ी खासियत है कि वे जो देखते थे उसे हूबहू लिखते थे। उन्होंने कहा कि आज जिस ढंग से कहानीकारों की फौज तैयार हो रही है और कुछ दिन बाद गुम हो जा रही है यह चिंता का विषय है। हम जिस समय में जी रहे हैं उस समय में जीने का कोई तुक समझ में नहीं आ रहा है। इस मौके पर पत्रकार एवं युवा कथाकार अभिज्ञात के कहानी संग्रह तीसरी बीवी का संजीव ने लोकार्पण किया। युवा लेखक हितेन्द्र पटेल ने कहा कि अभिज्ञात की कहानी सोचने को बाध्य करती है यही उनकी पहचान है। वरिष्ठ लेखक अरुण माहेश्वरी ने कहा कि अभिज्ञात की कहानियों में निराशा का बोध होता है। रचनधर्मी जीवन सिंह ने तीसरी बीवी संग्रह के कुछ कहानियों पर प्रकाश डाला। बांग्ला के वरिष्ठ कवि अर्धेन्दू चक्रवर्ती ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों में रचनाकारों की रचना पर सामूहिक रूप से चर्चा होनी चाहिए। अतिथियों का स्वागत व कार्यक्रम का संचालन भारतीय भाषा परिषद के निदेशक एवं समीक्षक डा. विजय बहादुर सिंह ने किया।

Tuesday, 4 January 2011

सर्पदंश

कहानी
शिखा पाण्डेय के लिए इंटर्नशिप एक चुनौती बन गयी थी. उसने सोचा भी न था कि डॉक्टरी का यह करियर उसे उस मुकाम पर पहुंचा देगा जहां उसे कठिन विकल्पों में से ही एक को चुनना होगा. कहां तो उसने सोचा था कि वह साइंस की तरक्की का लाभ इस देश के लोगों को पहुंचा सकेगी. खास तौर पर वह गांवों में उन लोगों को राहत देना चाहती थी जो चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में असमय ही दुनिया से कूच कर जाते हैं अथवा उपयुक्त इलाज न हो पाने के कारण छोटी मोटी बीमारियों से भी बरसों जूझते रह जाते हैं और वह बीमारी देखते देखते ही तिल से ताड़ बन जाती है.

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से वह बीएससी कर रही थी कि उसके सपनों को पंख मिल गये और वह प्रतियोगी परीक्षा में उत्तीर्ण हो गयी और कोलकाता के एक मेडिकल कॉलेज में उसका दाखिला हो गया. चार वर्ष का पाठयक्रम उसने पूरा कर लिया था अब छह माह का इंटर्नशिप उसे पास करना था जिसके बाद वह स्वतंत्र थी मेडिकल प्रेक्टिस के लिए. इस बीच उसके घर की हालत सोचनीय होती चली गयी थी. पिता ने ज़मीन बंधक रख दी थी. छोटी दो बहनें कुंवारी थीं और पिता को उम्मीद थी कि डॉक्टर बेटी अपनी कमायी से उन्हें पार लगायेगी. आखिर बेटी का भी तो कुछ कर्तव्य बनता है ऐसे पिता के प्रति जितने लोगों के तमाम भड़कावे के बावजूद उसे इतनी ऊंची तालीम हासिल करने दी.

शिखा की उम्र भी निकली जा रही थी किन्तु उन्होंने उस पर विवाह के लिए जोर नहीं डाला और उसके बाद वाली बेटी निशा का ब्याह दो साल पहले ही कर दिया और हाथ खड़े कर दिये कि अब किसी और बेटी को ब्याहने की उनकी स्थिति नहीं है शिखा ही अपनी नौका खुद पार लगाये और अपनी दो अन्य छोटी बहनों के लिए भी वक्त आने पर घर-बार खोजे.

लोग उन्हें समझाते थे बेटियां दूसरे के घर जाने वाली होतीं हैं. उनसे उम्मीद नहीं पाली जानी चाहिए. बहुत होगा तो वह इतना करेगी कि अपने लिए कोई डॉक्टर वर खोज लेगी लेकिन अन्य कोई उम्मीद करना बेकार है. लेकिन पिता को अपनी आस्था के लिए एक ठौर मिल गया था और वह थी उनकी बेटी शिखा. ईश्वर और शिखा उनके जीवन के दो ध्रुव बन गये थे जिसके बीच उनका जीवन परिक्रमा करता रहता था. इसमें भी शिखा की मुख्य भूमिका होती और ईश्वर उसके सहायक. उनकी चर्चा शिखा से शुरू होती और शिखा पर ख़त्म.

कभी शिखा छुट्टिओं में बनारस से कुछ किमी दूर स्थित अपने गांव लाखी जाती तो पिता की अपने से लगायी गयी उम्मीदों से सहम जाती. यदि वह उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी तो जाने क्या होगा....

यूं तो शिखा ने सारी बाधाएं पार कर ली थी. घर- परिवार व जीवन के अन्य उतार चढ़ाव की बाधाएं को अपने दिलो दिमाग से निकाल कर अपने करियर के बारे में सोचती और ध्येय को पाने में जुटी रहती. अब मंज़िल करीब थी. वह जल्द से जल्द मेडिकल प्रेक्टिस शुरू कर अपने परिवार की आर्थिक बाधाओं को दूर करना चाहती थी. मिट्टी का घर भी अब गिरने गिरने को था. पिछली बरसात वह झेल गया था जैसे तैसे लेकिन इस बार की वर्षा वह निकाल पायेगा इसमें संदेह था.

शिखा को इंटर्नशिप के लिए बंगाल दक्षिण 24 परगना जिले के एक ग्रामांचल के सरकारी अस्पताल दिया गया था जहां उसे छह महीने चिकित्सा करनी थी. उसे अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टरों के दिशा-निर्देश में काम करना था. कोलकाता से दो घंटे के बस के सफर के बाद वह अस्पताल पहुंचती और काम के बाद वापस लौटती. अस्पताल के हालत उसके लिए विस्मयकारी थे. किताबों से बाहर निकल कर व्यवाहरिक दुनिया में प्रवेश उसके लिए नया अनुभव था. उसने सोचा भी न था कि उसके ख्वाबों की हक़ीकत ऐसी होगी और उसके आदर्श धरे के धरे रह जायेंगे. मेडिकल सांइस की तरक्की को यहां की व्यवस्था मुंह चिढ़ा रही थी. अस्पताल में कुछ आठ दवाएं थी जिनसे उसे लोगों की तमाम बीमारियों का इलाज करना था. ऊपर से तुर्रा ये कि किसी भी मरीज को यह नहीं बताना था कि अमुक दवा नहीं है. दवा न भी हो तो मरीज के इलाज का नाटक जारी रखना था क्योंकि ऐसा न करने पर लोगों की नाराजगी का अस्पताल निशाना बनेगा और सरकार भी. व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न लग जायेगा. मामला विधानसभा में उठ सकता है. मीडिया तो यूं भी फुटेज के चक्कर में तिल को ताड़ बनाता रहता है. विपक्ष को बैठे बिठाये वामपंथी सरकार के खिलाफ़ मुद्दा मिल जायेगा. अधिक से अधिक उन्हें आज़ादी थी मामले को कोलकाता के किसी अन्य अस्पताल को रेफर कर दिया जाये. किन्तु ऐसे मामलों में भी कैफियत देनी पड़ेगी. शिखा ने गांव के किसी अस्पताल में प्रेक्टिस का विचार सिरे से खारिज कर दिया. ना वह बिना दवा के इलाज का स्वांग नहीं करेगी.

शिखा को अभी कुल चार दिन ही हुए थे और वह यहां की व्यवस्था से परिचित हो चली थी. परिचित ही नहीं हुई थी बल्कि वह इस व्यवस्था का हिस्सा बनने का मन बना चुकी थी. उसके पास कोई विकल्प नहीं था. इंटर्नशिप उसे पूरी करनी थी. मन कड़ा कर लिया था और वह व्यवस्था का कोई असर दिलो दिमाग पर न पड़े इसकी पूरी कोशिश में लगी थी. वह अपने मन को विचलित नहीं करना चाहती थी. वह लक्ष्य पर निगाह गड़ाये हुए थी. उसकी आंखों के सामने पिता थे. उनके सपने थे. बहनें थी उनकी जिम्मेदारियां थीं. गांव के लोग थे जिनकी वह शान व पहचान थी. गांव की पहली डॉक्टर वह बनेगी.

अस्पताल में उस दिन जैसे ही वह पहुंची तो पाया कि सर्पदंश का मामला आया हुआ है. बाईस साल का युवक था जिसे गांव वाले चारपाई पर लिटाकर ले आये थे. विधवा मां, दो कुंवारी बहनें धाड़ें मार-मार के रो रही थीं. और गांव के लोग थे जो उन्हें दिलासा दे रहे थे कि वह ठीक हो जायेगा. लो डॉक्टर आ गयी.... लोगों के चेहरे का तनाव थोड़ा कम हुआ. अस्पताल में फिलवक्त कोई और डॉक्टर था सो जिम्मेदारी उस पर थी. उसने पता किया सर्पदंश से निजात का कोई इंजेक्शन अस्पताल में नहीं था. उसे इलाज का अभिनय भर करना था. उसके समक्ष एक चुनौती थी और उसके इम्तहान की घड़ी. उसने मन कड़ा कर लिया. उसने पढ़ा था ज्यादातर सांप विषैले नहीं होते किन्तु कई लोग दहशत से मर जाते हैं. उसका अभिनय काम आ सकता था. इलाज के अभिनय से प्रभावित व्यक्ति का मनोबल ऊंचा उठ सकता था उम्मीद थी वह ठीक हो जायेगा. दवा से नहीं अपने-आप. उसने भगवान से मनाया कि जिस सांप ने काटा है वह विषैला न हो. किन्तु उसका कामनाएं फलीभूत होती नज़र नहीं आ रही थी.

इसी बीच एक और घटना घटी जिसने उसे झकझोर कर रख दिया. युवक की हमउम्र एक युवकी रोती बिलखती अस्पताल पहुंची. उसने अपने पास सिंदूर की डिबिया रखी थी. लगभग बेसुध होते युवक के समक्ष वह फूट पड़ी-‘मैं नहीं जानता तुम बचोगे कि नहीं. लेकिन तुम जान लो कि मैं तुम्हारी हूं. मैं तुम्हारी विधवा बन कर जी लूंगी मगर दूसरे से हरगिज़ शादी नहीं करूंगी. मैंने बहुत कोशिश की कि गांव वालों से अपना प्रेम छिपा लूं. मैं जानती हूं कि मेरे पिता इस शादी के लिए कभी राजी नहीं होंगे फिर भी मैं कोशिश में थी कि कभी न कभी उन्हें मना लूंगी. मगर अब वक्त नहीं बचा है. पता नहीं क्या होगा. तुम नहीं भी बचोगे तो यह जानकर जाओ कि मैं तुम्हारी हूं.’

और उसने अस्पताल में गांव वालों के सामने युवक से सिन्दूर अपनी मांग में भरवा ली. शिखा दहल गयी. उसकी आंखों से सब्र आंसू बन कर बह निकला. इस बीच युवक अचेत हो गया था. शिखा ने मन कठोर कर लिया और युवती से पूछा-'क्या तुम्हारे पास गाड़ी है?'

युवती के हां कहने पर उसने कहा-‘मैं जान गयी हूं इसे किस सांप ने काटा है. वह बहुत जहरीला है. उसका इलाज आसान नहीं. तुम इसे लेकर जल्द से जल्द कोलकाता मेडिकल कालेज चली जाओ. यहां उसका इलाज नहीं हो पायेगा.’

युवती ने लोगों की मदद से फौरन युवक को कार में बिठाया और गाड़ी चल पड़ी. लोगों को जैसे ही पता चला कि अस्पताल में इलाज संभव नहीं गुस्सा फूट पड़ा. अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टरों के लिए गालियां दागी जाने लगीं. इधर गांव के लोगों ने अस्पताल में तोड़फोड़ शुरू कर दी थी. शीशे की खिड़की को तोड़ता हुआ एक सनसनाता पत्थर उसके सिर पर लगा था और वह अचेत हो गयी.

उसे जब होश आया तो पाया कि वह अस्पताल के एक बेड पर पड़ी है और भारी संख्या में पुलिस बल अस्पताल में तैनात है. उसके कमरे के बाहर भी पुलिस थी. उसे सिर पर लगी चोट का भी अहसास हुआ किन्तु मन में संतोष का भी अनुभव किया कि सब कुछ के बावजूद वह एक युवक की जान बचाने में सफल रही. इस बीच उसका बयान लिया गया. वहां उसके सीनियर डॉक्टर्स भी थे. पता चला कि सर्पदंश से युवक की मौत हो गयी है. लोग अस्पताल के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं. एहतियात के तौर पर पुलिस बुलायी गयी है.

सूखा सूखा कितना सूखा

कहानी
वह अदना सा अंशकालिक पत्रकार था। एक बड़े अख़बार का छोटा सा स्ट्रिंगर। उसका ख़बरों की क़ीमत शब्दों के विस्तार पर तय होती थी, ख़बरों की गहराई और महत्त्व पर नहीं। जिस ख़बर के जुगाड़ में कई बार उसका पूरा दिन लग जाता उसकी लम्बाई कई बार तीन-चार कालम सेंटीमीटर होती।

ऐसा होने पर वह अपने आपको ठगा सा महसूस करता। जिन दिनों अख़बार के विज्ञापन की दरें 215 रुपये प्रति कालम सेंटीमीटर हुआ करती थी उसके छपे समाचार पर 2 रुपये 15 पैसे प्रति कालम सेंटीमीटर मिलता था अर्थात सौंवा हिस्सा। पांच बरस बीत गये विज्ञापन की दरें बदलीं मगर नहीं बदला तो उसका मानदेय। इसके अलावा एक सुनिश्चित मानदेय रिटेनरशिप के नाम पर तीन सौ रुपये प्रतिमाह मिलता था। यह अनायास नहीं था कि स्ट्रिंगर ने स्फीति को अपनी पत्रकारिता का गुण बना लिया। ख़बर में अनावश्यक फैलाव और दुहराव न होता तो उसकी दैनिक कमाई एक रिक्शावाले के बराबर भी न हो।

और उधर डेस्क की ड्यूटी इस काम के लिए लगी होती थी कि स्ट्रिंगरों की ख़बरों की स्फीति और अनावश्यक हिस्सों को काटा-छांटा जाये। काट-छांट करने वाले मज़े में थे। कम्पनी की तरफ़ से उन्हें तमाम सुविधाएं थीं। वे एसी युक्त कार्यालय में बैठे-बैठे स्ट्रिंगरों की मूर्खताओं की चर्चा कर फूले न समाते और अपने को विद्वान मानने का वहम पाले रहते। एक ही ख़बर पर दोहरी मेहनत होती थी। सब कुछ अरसे से ठीक-ठाक चल रहा था किन्तु एक दिन स्ट्रिंगर की पेशागत ज़िन्दगी में उथल-पुथल मच गयी।

हुआ यूं कि उस दिन उसके पास ख़बरों का खासा टोटा था और उसने जिले के कुछ हिस्सों में सूखे की एक खबर गढ़ दी। यूं भी बारिश के दिनों में कई दिन से बारिश नहीं हुई थी। उसने अनुमान लगाया था कि यह हाल रहा तो सूखा पड़ सकता है। उसने ख़बर बहुत हल्के तौर पर लिखी थी उसे क्या पता था कि डेस्क उसे खासा तूल दे देगा। डेस्क पर एक अति उत्साही जीव आये हुए थे। स्ट्रिंगर कोलकाता के एक दूर-दराज़ जिले का था जो जिला मुख्यालय से भी काफी दूर एक क़स्बे में रहता था जहां से वह अपनी खबरें फ़ैक्स से भेजता था।

फ़ैक्स करने के लिए उसे तीन किलोमीटर दूर बाज़ार में आना पड़ता था। सूखे की ख़बर को फ़ैक्स तो उसने किया था किन्तु दूसरे दिन वह ख़बर लगी नहीं। अगले दिन वह अन्य ख़बरें फ़ैक्स करने गया तो वहीं से फ़ोन कर सूखे की स्टोरी के सम्बंध में डेस्क से पूछा तो कहा गया-‘तुम लोगों को क्या पता कि ख़बर किसे कहते हैं और कैसे बनती है? तुम तो बस वह करो, जो कहा जा रहा है। यह बहुत बड़ी ख़बर है जिसे तुमने बहुत मामूली ढंग से लिखी है।’

स्ट्रिंगर किन्तु-परन्तु करता रह गया और दूसरी ओर से फ़ोन काट दिया गया। अगले दिन उसने वही किया जो कहा गया था। सरकारी महकमे से जिले में सूखे से सम्बंधित पिछले रिकार्ड जुटाये और भेज दिया। अगले दिन सूखे को लेकर जो समाचार छपा उससे वह खुद हैरत में पड़ गया और उसका कलेजा कांप गया। खबर पहले पेज़ पर थी और कहीं इंटरनेट आदि से मैनेज किया गया फ़ोटो था दरकी हुई ज़मीन का। ख़बर की विषयवस्तु के साथ खिलवाड़ किया गया था और जो सूखे की आशंका उसने व्यक्त की थी उसे डेस्क ने बदलकर सूखा पड़ा कर दिया था। उसे लगा कि अब तो उसकी स्ट्रिंगरशिप गयी। रोज़गार का यह रास्ता भी बन्द। वह आशंका से बुरी तरह त्रस्त हो गया।

कोलकाता के दूसरे अखबारों में सूखे की ख़बर सिरे से नदारत। सिर्फ़ एक अख़बार में ख़बर थी। उसे एक्सक्लूसिव माना गया और किन्तु बाक़ी अख़बारों से संवाददाता और फ़ोटोग्राफ़र भेजे गये सूखे के कवरेज के लिए। चूंकि वह सुदूर जिला था अधिकतर अख़बारों में स्टाफ़ रिपोर्टर नियुक्त नहीं थे इसीलिए स्टाफ़ रिपोर्टर भेजे गये थे। जिले में कुछ दिनों तक सूखे के
कवरेज के लिए।

पत्रकारों ने एक-दूसरे से सम्पर्क किया और एक साथ एक ही ट्रेन से सूखाग्रस्त जिले में पहुंचे। इलेक्ट्रानिक मीडिया भी साथ था। रास्ते में ही तय हो गया था कि क्या करना है। जिस स्ट्रिंगर ने यह ख़बर सबसे पहले ब्रोक की है उससे सम्पर्क साधना है। उस अख़बार का फ़ोटोग्राफ़र इस ट्रेन से जा रहा था, जिसे वहां पहुंचते ही स्ट्रिंगर स्टेशन पर रिसीव करने वाला था। बाक़ी पत्रकार भी उसी के भरोसे थे कि वह प्रभावित इलाके का बासिन्दा है इसलिए स्थिति से पूरी तरह वाक़िफ होगा और उन सबकी मदद करेगा।

स्टेशन के पास ही के होटल में सारे पत्रकार ठहरने वाले थे जहां से वे स्टोरी कवर करके फ़ोन और ईमेल व अन्य साधनों से भेजने वाले थे। इतने सारे रिपोर्टर-फोटोग्राफ़र जब स्टेशन पर एक साथ उतरे कोस्ट्रिंगर के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। वह मन ही मन भगवान को याद करने लगा जबकि वह विचारधारा से किसी हद तक मार्क्सवादी था। होटल में जब सब फ्रेश हो लिए और नाश्ते-पानी के बाद उसके साथ कूच करने के लिए तैयार हुए तो उन्हें बताया गया कि यह जिला अत्यंत पिछड़ा हुआ है और ज़्यादातर गांवों में सड़कें नहीं पहुंची हैं सो उन्हें पैदल ही चलना होगा।

स्ट्रिंगर बेमतलब उन्हें खेतों और पतली पगडंडियों पर देर तक चलाता रहा फिर एक बड़े से तालाब के पास ले गया जो अरसे से सूखा पड़ा था। उसने बताया –‘यह तालाब पानी से लबालब भरा रहता था जो अब सूख गया है।’ उसने वह परती ज़मीनें दिखायी जिस पर कभी खेती हुई ही न थी और दरारें पड़ी हुई थीं और कहा-‘इसमें फसलें लहलहाती हैं जो अब सूखे की वज़ह से बेहाल हैं।’

शहरी पत्रकारों को ग्राम्य जीवन की न तो पूरी जानकारी थी और ना ही जानकारी हासिल करने की ललक और ना ही कोई दूसरा चारा। वह दो-एक ऐसे नलकूपों तक ले गया जो सरकारी खानापूरी के लिए लगाये तो गये थे लेकिन जिनमें लगने के बाद भी कभी पानी नहीं आया था। एक सूखा कुंआ भी उसने दिखाया जो बरसों से उसी अवस्था में था किन्तु उसके बारे में जानकारी दी कि वह इस सूखे के कारण ही इस अवस्था में है। उसकी बतायी गयी सूचनाएं मीडिया के लोग दर्ज़ करते रहे। तस्वीरें उतारी गयीं।

टीवी वालों ने भी स्थलों की बाइट ली। उन्हें एक पेड़ की छांह में बिठाकर स्ट्रिंगर पास ही के गांव में गया और लोगों को समझा-बुझाकर वहां ले आया जो सूखे की गवाही देने को तैयार थे। गांव वालों को उसने समझाया था कि यदि वे सूखे की गवाही देंगे तो उन्हें सरकार से पैसे मिलेंगे। लोग खुशी-खुशी गढ़ा हुआ झूठ बोलने को तैयार हो गये। दो-तीन युवक साइकिल से पड़ोस के गांव भी दौड़ा दिये गये जो गढ़े झूठ का साथ देने के लिए तैयार किये जाने के मक़सद से भेजे गये। फिर क्या था सूखे के पुराने दिनों को गांव वाले याद करते और इस सूखे के बारे में भी वैसा ही बयान देते। ख़बरें बनने लगीं। कैमरों के फ़्लैश चमकने लगे। टीवी वाले अलग-अलग लोगों के बयान लेते रहे।

अगले दिन सारे अख़बारों में सूखा और उसकी तस्वीरें छा गयीं। टीवी पर भी सूखा दिखा। मीडिया ने दूसरे दिन अपनी कलाकारी दिखायी लोगों से कहा गया कि वे वर्षा के लिए पूजा-अर्चना करें, नमाज़ पढ़ें ताकि उसका कवरेज शानदार दिखायी दे। गांव वालों ने ऐसा ही किया। मीडिया के वहां होने की ख़बर पाकर स्थानीय विधायक, सांसद और कलेक्टर सहित तमाम अधिकारी वहां पहुंच गये। उन सबके चेहरे पर रौनक थी। उनके मन में पिछले सूखे से हुई कमाई की याद ताज़ा हो आयी थी। और इस बार तो सूखा छप्पर फाड़ कर आया था। बैठे बिठाये। सरकारी राहत का ज़्यातातर माल ज़ेब में आने की संभावना बन रही थी। उन्हें तो पता ही न था कि कब सूखे ने यूं उनके यहां दस्तक़ दी थी। अख़बारों के रास्ते।

सब मीडिया के सामने सूखे की भयावहता का बढ़-चढ़ कर वर्णन कर रहे थे और सरकार से खासी मदद मांग रहे थे। टीवी पर ही उन्होंने सुना कि सम्बंधित मंत्री ने पहले तो मीडिया की ख़बरों के आधार पर प्रधानमंत्री को तत्काल पत्र लिखा था और सूखा से निपटने और राहत के लिए करोड़ों रुपयों की पुरज़ोर मांग कर दी थी। वे ज़ल्द ही इलाके के दौरे पर आने वाले थे। मुख्यमंत्री राहत कोष से भी राहत राशि की घोषणा कर दी गयी थी।

प्रधानमंत्री ने भी आश्वासन दिया था। तीन दिन से मीडिया में सूखे की ख़बरों का ज़बर्दस्त कवरेज रहा। खेत का दरकी हुई ज़मीन, सूखे तालाब, नलों की सूखी हुई टोंटियां, चारे के अभाव में दुबले हुए मवेशी न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में दिखायी दे रही थीं। सूखे के प्रचार दौड़ में मीडिया एक-दूसरे को पछाड़ने में लगे थे और यह स्ट्रिंगर के होश उड़ाये हुए था। उसका दिल रह-रह कर डूबता-उतराता रहा। यह सब उसी की ग़ल्तियों का नतीज़ा है। उसका फ़रेब सामने आया तो क्या होगा? क्या पता उसे लम्बी सज़ा ही न हो जाये? तीस-चालीस रुपये की हवाई स्टोरी उसे कितनी महंगी पड़ेगी वह सोच नहीं सकता था। और अब सच स्वीकार करने का कोई रास्ता न बचा था।

यह सब कुछ चल रहा था कि अचानक सब कुछ बदल गया एकाएक तेज़ बारिश होने लगी। अधिकारियों के चेहरे उतर गये। सांसद और विधायक की गाड़ियां एकाएक वहां से नदारत हो गयीं लेकिन जो निराश नहीं था वह था स्ट्रिंगर। चलो सूखे से पीछा छूटा। उसने चैन की सांस ली। खुश था मीडिया भी। स्टोरी में ट्विस्ट आ गया था।

लोगों से मीडियाकर्मियों ने गुजारिश की कि वे बारिश में नाचें। लोगों की बारिश में नाचती तस्वीरें और टीवी फुटेज लिये गये। यह सूखे से निज़ात पाये लोगों का उल्लास था जो मीडिया की नज़रों से दुनिया ने देखा। इसी बीच स्ट्रिंगर के आफ़िस से मोबाइल पर फ़ोन आया। फ़ोन पर स्ट्रिंगर को सूखे के कवरेज में पहल के लिए बधाई दी गयी और बताया गया कि पुरस्कार स्वरूप उसका रिटेनरशिप दो सौ रुपये प्रतिमाह तत्काल प्रभाव से बढ़ा दिया गया है।

Friday, 2 July 2010

कहानियों का कलाइडोस्कोप


साभारःद संडे इंडियन, 11 जुलाई 2010

अभिज्ञात की कहानियों का यह संग्रह उनकी कुल दो दर्जन प्रकाशित अप्रकाशित कहानियां समेटे हुए है. इनमें किंचित लम्बी अधिकतर छोटी तथा कुछ लघु कथाएं शामिल हैं.अभिज्ञात की इन कहानियों की खूबी यह है कि इनकी किस्सागोई पाठकों को कहानी के साथ लिए चलती है. पढ़ने वाला कहानी का महज पाठक न होकर उसका एक हिस्सा बन जाता है. उल्लेखनीय बात यह है कि अभिज्ञात की कहानियों का सिर्फ कथ्य और उसके लिहाज से उसकी भाषा ही नहीं बदलती पूरा का पूरा शिल्प और शैली भी बदल जाती है. इन दो दर्जन कहानियों को पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है कि यह किताब जैसे कहानियों का पहुदर्शी या एक कैलाइडोस्कोप हो या फिर अलग-अलग रंग-ढंग की कथा शैलियों से बना एक खूबसूरत गुलदस्ता.
अभिज्ञात की कहानियों का कथ्य तथा बुनावट की विविधता को देखकर लगता है कि उनका अनुभव फलक काफी विस्तृत है.लेखक पेशे से पत्रकार हैं, इसलिए यह बात आसानी से समझी जा सकती है. आधुनिकता के नाम पर बेवजह अमूर्तता या अपना दर्शन बघारने की बजाए अभिज्ञात ने कहानियों को धरातल पर ही रखा. सहज, सुबोध और तरल. इसी के चलते अभिज्ञात की कहानियां समाज के सरोकारों, संवेदनाओं, समस्याओं, रिश्ते नातों की जटिलताओं को भी बिना किसी तरह के शब्दाडंबर फैलाए, उपदेश पिलाये बेहद साफगोई के साथ उकेरती हैं. वह चाहे व्यवस्थागत खामियों की बात कर रहे हों या समाजिक विद्रूपता की, बिना अतिरंजकता का सहारा लिए वे चौंकाते हैं और उस पर ध्यान आकर्षित कर के लिए मजबूर करते हैं. उनकी यह खूबी उन्हें बड़े रचनाकार की पांत की तरफ ले जाती है.
कहानी संग्रह में शामिल सर्पदंश, शिनाख्त नहीं जैसी कुछ कहानियां साधारण हैं लेकिन एक हिट भोजपुरी फिल्म की स्टोरी, क्रेजी फैंटेसी की दुनिया या फूलबागान का सपना जैसी कहानियां अभिज्ञात के कथा कौशल की बेहतर परिचायक हैं. कहानी विधा में रुचि रखने वाले पाठकों को यह पुस्तक निराश नहीं करेगी.

Monday, 14 June 2010

अभिज्ञात की दुनिया में सच के 25 रूप

समीक्षा
सुधीर राघव
( हिन्दुस्तान, चंडीगढ़ 13 जून 2010 को प्रकाशित)
अभिज्ञात अपनी बसाई दुनिया लेकर फिर पाठकों के सामने हाजिर हैं। यह दुनिया है उनके लिए जो सपने देखना पसंद करते हैं, मगर हर कहानी पाठक को सपनों के आकाश से हकीकत के उस धरातल पर ले आती है, जो कढ़ाई में खदकते हलवे की तरह बुलबुले छोड़ रहा है। हर बुलबुला जिंदगी के एक सच से पहचान करवाता है और अपना स्वाद छोड़ जाता है। सच के इतने रूप लेखक अपनी जिंदगी के चारों ओर से ही तलाश कर लाया है। अभिज्ञात के अंदर छुपे पत्रकार की पारखी नजर और संवेदनशील कवि इस सच को शब्दों की सजीवनी से साक्षात करता है। मिस्र की संरक्षित ममियां भले ही अपने युग को फिर कभी नहीं जिएंगी पर अभिज्ञात के पात्र लौट-लौटकर आते हैं और सीधे पाठक के जेहन में उतर जाते हैं।

इस संग्रह की अधिकतर कहानियां कादम्बिनी, हंस, वागर्थ, वर्तमान साहित्य और वामा जैसी प्रतिष्ठित साहित्यक पत्रकाओं में छप चुकी हैं। पहली ही कहानी -कॉमरेड और चूहे- हमारे चिकित्सा शिक्षण संस्थानों के हालात बयां करती है कि किस तरह एक आदर्श को कुतरने के लिए यहां के चतुर्थश्रेणी कर्मचारी ही काफी हैं। स्वार्थ अभिज्ञात की लेखनी से नए अर्थ लेकर निकलता है, कहानी -औलाद- में। एयरहोस्टेस मां अपने नाजायज नवजात को न बचाने के लिए डॉक्टर से कहती है, मगर डॉक्टर उसे इसलिए बचाना चाहता है, क्योंकि यह उसका पहला ही केस है। लघुकथा -बंटवारे-यह बता कर चौंकाती है कि जब कोई घर बंटता है तो सबसे ज्यादा खुश भिखारी होते हैं कि अब उन्हें एक की जगह चार घर से भीख मिलेगी। -तीसरी बीवी-कोलकात्ता में बसे बांग्लादेशियों की बदतर जिंदगी की झलक दिखाती है। आज स्त्री भले अपनी मर्जी से प्रेम विवाह करे मगर पुरुष उसके आर्थिक और यौन शोषण पुराने हथकंडों अपना कर ही करता है। यहां कोई बदलाव नहीं है। औरत की आजादी किसी को बर्दाश्त नहीं। भले ही कुलटा कहानी में किसी पात्र का नाम नहीं है मगर यह कुलटा की गाली से भयभीत सभी स्त्रियं के साझा डर का दर्शाती है। पति-पत्नी के बीच नौकझौंक की एक बहुत ही रोचक कहानी है फिर मुठभेड़। यह बिल्कुल नए अंदाज में हैं, शादी की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर भी यह जोड़ा दिनभर यह वादा करने के बाद कि आज नहीं लड़ेंगे रात को जरा सी बात पर आपस में मारपीट करके ही सोता है। इस कहानी संग्रह में कुल 25 कहानियां हैं और सब सच के इतने ही रूप दिखाती हैं।

इस तरह कहानियां मर्म को बेधती हैं, हूक पैदा करती हैं तो कभी ढांढस बंधाती हैं। इनमें अनुभव, संवेदना और मर्म साथ-साथ चलते हैं। लेखक किसी एक अंदाज में बंधी किस्सागोई नहीं करता, इसलिए पाठक दूर तक उसके साथ चलता है और ऊबता भी नहीं है।

कहानी संग्रह-तीसरी बीवी
प्रकाशक : शिल्पायन
मूल्य : 150 रुपये
आवरण चित्र : डॉ. लाल रत्नाकर

Sunday, 6 June 2010

एक बेचैन करने वाली दुनिया से गुज़रते हुए

पुस्तक समीक्षा
-उमेश कुमार राय
एक समय था जब कहानियां आलोचना के आधार पर लिखी जाती थी। कहानियों की भाषा, विषयवस्तु, भूमिका और उनकी इति श्री आलोचना को ध्यान में रखकर ही की जाती थी। लेकिन इधर कुछ समय से इस परंपरा में काफी बदलाव आया है। अब के रचनाकार आलोचनाओं के मानदंडों के आधार कहानियां नहीं लिखते। वे कहानियों में नये प्रयोग कर रहे हैं जिस कारण अब कहानियों के आधार पर आलोचना लिखने की जरूरत महसूस होने लगी है। खास तौर पर अभिज्ञात जैसे कथाकारों की कहानियों की व्याख्या के लिए कहानी आलोचना के मानकों को अधिकाधिक औज़ारों से लैस होना होगा। यथार्थ, फैंटेसी और कल्पना के कलात्मक रचाव के साथ समकालीन जटिलताओं को उन्होंने जिस तरीके से अपनी कहानियों उकेरा है, वह पाठक को भले लगभग सम्मोहित करता हो पर उसकी व्याख्या कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। पत्र-पत्रिकाओं में अपनी दर्जन भर महत्वपूर्ण कहानियों से भी साहित्य जगत का ध्यान अपनी ओर बरबस आकृष्ट करने वाले अभिज्ञात का पहला कहानी संग्रह हिन्दी कहानी की एक महत्वपूर्ण घटना है क्योंकि इसके बाद कहानी का संसार वह नहीं रह गया है जो पहले था। अपनी कहानियों से कहानी का स्वरूप बहुत बारीकी से उन्होंने बदला है। उनके कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' की कहानियां उदय प्रकाश की कहानियों के उदय के बाद एक नया प्रस्थान हैं। संग्रह की कहानियों की शुरुआत दिलचस्प तरीके से होती है और वह अन्त तक पाठक पर अपनी गिरफ्त बनाये रखने में कामयाब हैं। इन कहानियों की एक विशेषता यह है कि इनके नायक शेक्सपीयर के पात्रों की तरह आत्मग्लानि से भरकर आत्महत्या की राह नहीं चुनते बल्कि वे समय की मांग समझकर उन परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं। यह समझौता पाठक को देर तक झकझोरता है और स्थितियों को बदलने में उनकी पहल की भी मांग करता दिखायी देती है। कहानियों में घटनाएं परिस्थितियों से संचालित हैं इसलिए यह कहानियां चुपचाप व्यवस्था की खामियों की तरफ पाठक का ध्यान खींचती हैं और उनकी विसंगतियों को उजागर करती हैं। कहानियों के पात्र यथार्थ से टकराते हैं टूटते हैं, पर पलायन नहीं करते। उनकी जीजिविषा ही उनकी सम्पदा बनती है। तभी तो अपनी
बेटी का भरण पोषण कर पाने में असमर्थ 'तीसरी बीवी' कहानी का नूर अपनी बेटी को हबीब की तीसरी बीवी महज इसलिए बना देता है क्योंकि सर्द रात में उसके पास बिस्तर नहीं है। जश्न कहानी का करमु कौवे का मांस खाने से भी नहीं हिचकता। संग्रह की सभी कहानियों के पात्र और
नायक जीवन से जुड़े हुए हैं। कई कहानियों के नायक ड्राइवर, मिल मजदूर, झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाले लोग हैं जिन्हें हमलोग हर रोज आसपास देखते और रूबरू होते हैं लेकिन उनकी वस्तुस्थिति से हम अपरिचित है।
संग्रह की पहली कहानी कामरेड और चूहे हंस में प्रकाशित होने के बाद चर्चा में आयी थी। कहानी के माध्यम से कम्युनिस्ट शासित राज्यों में सर्वहारा वर्ग की दारुण स्थिति को दर्शाया गया है और साथ ही इसके माध्यम से यह बताने की कोशिश की गयी है कि यदि गरीब को उनका उचित मेहनताना ना मिले तो किस तरह वे संवेदन शून्य हो जाते हैं और शव को भी टुकड़ों टुकड़ों में बेच देते हैं। इसमें व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार को भी दिखाया गया है जिसके चलते अच्छी नीयत से काम करने वालों को पछतावे के सिवा कुछ और हाथ नहीं लगता। लोगों की कुर्बानियां व्यर्थ चली जाती हैं।
संग्रह की कहानी जश्न यूं तो है बहुत छोटी बमुश्किल 10-12 पंक्तियों की लेकिन सबसे दमदार। कहानी की शुरुआत मिल मजदूर करमु के पगार मिलने से होती है। पगार मिलने से करमु काफी खुश है और काफी दिनों बाद मछली खरीदकर लाया है। यह देखकर उसके बच्चे और पत्नी भी बल्ली उछल रहे हैं क्योंकि काफी दिनों बाद उन लोगों को मछली खाने को मिलेगी। मछली धोने के लिए वह नाले के पास जाता है ताकि उसके पड़ोसी देखकर यह समझ लें कि वह भी मछली खा सकता है। वह नाले के पास मछली धो रहा होता है कि एक कौवा थाली में चोंच मार
देता है जिस कारण मछलियों के टुकड़े नाले में बह जाते हैं। मछलियों का नाली में बह जाने से वह इतना गुस्सा हो जाता है कि चप्पल उठाकर कौवे को दे मारता है और कौवा वहीं फर्श पर गिर पर प्राण त्याग देता है। इसके बाद वह मरे हुए कौवे घर ले जाता है और उसी को पकाकर खा जाता है। कौवे का मांस खाते वक्त करमु को घृणा नहीं बल्कि तृप्ति होती है। कहानी में कौवा उन मिल मालिकों का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो मजदूरों का हक डकार जाते हैं। वहीं, करमु के रूप में देश का सर्वहारा वर्ग खड़ा है। कहानी के माध्यम से यह बताने की कोशिश की गयी है कि यदि मजदूरों को उनके हक से इसी तरह बेदखल किया जाता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देश के करमु इन धन्ना सेठों को कौवों जैसी स्थिति कर देंगे।
क्रेजी फैंटेसी की दुनिया संग्रह की एक कहानी उल्लेखनीय कहानी है। इसके बारे में यह दावा किया जा सकता है कि यह विश्व स्तर की किसी भी कहानी के टक्कर की है। इसकी शुरुआत जिस तरीके से की गयी है उससे यह विज्ञान कहानी प्रतीत होती है लेकिन ज्यों ज्यों कहानी आगे बढ़ती है इस पर से रहस्य की परत हटती जाती है और फिर पता चलता है कि कैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियां तीसरी दुनिया में अपने उत्पादों को बेचने के लिए बीमारियां फैला रही हैं और केन्द्र सरकार बजाय ठोस कदम उठाने के उन कंपनियों की पिछलग्गू बनी हुई है। इसमें उन अंतर्राष्ट्रीय साजिशों को भी बेनकाब किया गया है जो अमीर देश गरीब देशों के साथ करते हैं और उनका शोषण करके भी उन पर अपनी मेहरबानियां लादते दिखायी देते हैं। इस कहानी में तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के ताने-बाने को भी उजागर किया गया है।
कहानीकार चूंकि पत्रकारिता से जुड़े हैं इसीलिए उन्होंने पत्रकारिता की दुनिया पर भी एक कहानी लिखी है। 'सूखा सूखा कितना सूखा' कहानी के मार्फत पत्रकारिता की सफेद स्याह दुनिया का यथार्थ दिखाया गया है। कैसे एक अखबार अपना विक्रय बढ़ाने के लिए झूठी खबरों को सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करता है और किस तरह पत्रकार बनने की मनसा लेकर इस क्षेत्र में कूदे उत्साहित युवाओं का शोषण किया जाता है, यह सब इस कहानी में मौजूद है।
फूलबागान का सपना में एक मजदूर के जीवट की कहानी तो कहता ही है मौजूदा व्यवस्था में उसकी नियति को भी बयान करता है। औलाद कहानी मौजूदा दौर के लोगों को हृदयहीनता को व्यक्त करती है तो कुलटा और उसके बारे में आदि कहानियां स्त्री के दर्द और संघर्ष को व्यक्त करने में सक्षम हैं। कायाकल्प एक बच्ची के जीवन के बदलावों का विश्वस्त मनोवैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करती है। एक हिट भोजपुरी फिल्म का कहानी नौटंकी वालों से संघर्ष को भी व्यक्त करती है और उनके दमखम को भी। कुछ मिलाकर इन कहानियों से गुजरना समकालीन जीवन को एक नये संवेदनशील नजरिये से देखना और जानना है और बदलाव की एक बेचैनी को अपने मनोजगत में जगाना है क्योंकि जिस दुनिया से पाठक गुजरा है कुल मिलाकर एक बेचैन दुनिया है।

Sunday, 18 April 2010

जीवन संघर्ष और जिजीविषा की बेहतरीन कहानियां

समीक्षा
-कमलेश पाण्डेय
कविता के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले महानगर के रचनाकार डॉ. अभिज्ञात का पहला कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' का सद्य: प्रकाशन शिल्पायन ने किया है। डॉ. अभिज्ञात के इस पहले कथा संग्रह में हंस, वसुधा, वर्तमान साहित्य, कादंबिनी, नया ज्ञानोदय जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपी उनकी कई कहानियों के साथ कई अप्रकाशित कहानियां संकलित हैं। देश के विभिन्न समाचारपत्रों में कार्यानुभव रखने वाले डॉ.अभिज्ञात की विशेषता है कि वे अपनी कहानियों में जीवन संघर्ष तथा पात्रों की जिजीविषा को कई बार सीधे-सीधे तो कई बार व्यंजना की शैली में प्रस्तुत करते हैं। उनकी कहानी 'कॉमरेड और चूहे' ऐसी ही एक कहानी है, जिसमें लोगों के हित का अंतिम क्षण तक स्वप्न देखने वाले एक कम्युनिस्ट का शव अपनी तमाम उदात्त भावना के बावजूद आखिरकार व्यवस्था का शिकार हो जाता है। उसके शव को समाज रूपी चूहा कुतर जाता है। ऐसा नहीं कि डॉ.अभिज्ञात की कहानियों में नैराश्य की ही प्रधानता है अथवा वे अपनी कहानियों के माध्यम से कोई प्रेरणा देते नहीं दिखते। इनकी कहानियों के पात्र अपनी स्थितियों में बदलाव लाने को प्रस्तुत हैं। 'एक हिट भोजपुरी फिल्म की स्टोरी' के पात्र विरासत में मिली अपनी परंपरा को जिलाये रखने की भावना के साथ-साथ आधुनिकता को भी अपनाने की पूरी जद्दोजहद में जुटे हैं तथा आखिरकार उन्हें अपने मकसद में कामयाबी हासिल होती है। एक ओर जहां डॉ.अभिज्ञात समाज की विभिन्न परिस्थितियों के कलात्मक विश्लेषण में जुटे हैं, वहीं पात्र दर पात्र वे मानव मन का विश्लेषण भी करते हैं। समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़े इनके पात्र अपने चरित्रों के अनुसार परिस्थितियों के अनुरूप आचरण करते हैं।
यह डॉ.अभिज्ञात की खासियत है कि वे पाठकों को विशेष तौर पर चौंकाते नहीं हैं बल्कि इनकी कहानियों में कथानक धीरे-धीरे स्वत: आगे बढ़ता है। हालांकि 'क्रेजी फैंटेसी की दुनिया' में डॉ.अभिज्ञात पाठकों के सामने एक ऐसा रचना संसार प्रस्तुत करते हैं, जिसमें प्रकृति के सानिध्य से रक्षा, विनाश की परिकल्पना के साथ-साथ मानवीय मूल्यों के क्षरण का लेखा-जोखा सा पाठकों के सामने मानो उपस्थित हो जाता है। इसी प्रकार इनकी 'तीसरी बीवी' शीर्षक कहानी भी व्यवस्था के कू्रर पंजे में जकड़े लोगों के मानवीय संवेदनाओं को उजागर करती है। डॉ.अभिज्ञात की कहानियां विशेष तौर पर व्यवस्था में जकड़े समाज के दबे कुचले लोगों के पक्ष में उनके जीवन संघर्ष की दास्तान हैं।

अभिज्ञात के कहानी संग्रह तीसरी बीवी की समीक्षा







Saturday, 17 April 2010

सामाजिक विसंगतियों का आख्यान

समीक्षा
-लोकेन्द्र बहुगुणा
अभिज्ञात के सद्य प्रकाशित कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' में संकलित कहानियां वर्तमान समाज के जीवन मूल्यों, सपनों और विसंगतियों की जोर आजमाइश का आख्यान हैं। अभिज्ञात ने अपने आसपास घट रही रोजमर्रा की घटनाओं को अलग-अलग नजरिये से अपनी कहानियों में चित्रित किया है।
संग्रह में विभिन्न समय पर लिखी गयी 25 छोटी-बड़ी कहानियां हैं, जिनमें कई विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुई हैं। समाज में हो रहे बदलाव पर लेखक की पैनी नजर है और उसे वे जहां-तहां से निकाल कर पाठक के सामने लाते हैं? किस्सागोई के हिसाब से वे कहानियां पाठक को ज्यादा आकर्षित करती हैं जो आत्म कथ्यामक या संस्मरणात्मक अंदाज में लिखी गयी हैं लेकिन कई कहानियों में सशक्त विषय- वस्तु के बावजूद सपाटबयानी है लेकिन इन सीमाओं के बावजूद इसमें दो राय नहीं कि कहानियां सामाजिक सरोकार के वे सवाल छोड़ जाती हैं जिनसे बचने की कोशिश तमाम दावों के बावजूद जारी है।
संग्रह की सबसे लंबी कहानी 'क्रेज़ी फैंटेसी की दुनिया' और सबसे छोटी 'बंटवारे' हैं जो अपने अपने ढंग से आज के 'सच' को सामने लाती है। कथ्य और शिल्प की दृष्टि से 'क्रेज़ी फैंटेसी की दुनिया' को अगर संग्रह की सबसे बेहतर कहानी कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। व्यवस्था की हकीकत को कहानी के जरिये जिस तरह पेश किया गया है वह काबिलेगौर है। कहानी का नायक एक वैज्ञानिक है, जो पारिवारिक एवं सामाजिक जिम्मेवारियों से उदासीन अन्वेषण की अपनी दुनिया में मस्त रहता है। उसे अपने पारिवारिक दायित्वों का तब बोध होता है जब उसकी पत्नी का देहांत हो जाता है और एकमात्र संतान पुत्री की देखभाल में उसे माता और पिता दोनों की भूमिका निभानी पड़ती है। पुत्री को मां की कमी और अकेलापन न खले इसके लिए वह कहानियां गढ़ने लगता है और धीरे-धीरे उसे भी इस लेखन में मजा आने लगता है। ऐसे ही एक प्रयास में वह एक अजीबोगरीब चरित्र की कल्पना करता है। वह अपनी कहानियों में क्रैजी फैटेंसी नाम के एक खास चरित्र गढ़ता है जो मन चाही शक्ल अख्तियार करने में माहिर है। उसकी ये कहानियां और पात्र क्रैजी फैंटेसी पाठकों द्वारा इस कदर पसंद किये जाते हैं कि वे इस कल्पना को हकीकत मानने लगते हैं। ऐसे वक्त में मुल्क में एक अजीब तरह की बीमारी फैलती है और लोग इसकी वजह क्रैजी फैंटेसी को बताने लगते हैं। पता चलता है कि यह बीमारी एक खास तरह के विषाणु से फैलती है और यह विषाणु किसी विकसित मुल्क की देन है। इस फैंटेसी के जरिये आधुनिक समाज व तंत्र की विसंगतियों को दिलचस्प अंदाज में उजागर करने की कोशिश की गयी है। वास्तविकता और कल्पना की यह मिलावट अपने निहितार्थ के कारण आधुनिक समाज की आशा-आशंकाओं और संभावनाओं के व्यापक विस्तार का परिचय देती है। दरअसल कुछ समय पहले जब पहले बर्ड फ्लू और बाद में स्वाइन फ्लू( जिसका असर मुल्क में अब भी बरकरार है ) के बारे में वैश्विक स्तर पर सूचनाओं के आदान- प्रदान और जन जागरण की मुहिम के दौरान समाज के विभिन्न स्तरों पर इस तरह के सवाल उठे थे। वैज्ञानिक गतिविधियों और प्रशासनिक व्यवस्था से जड़े लोगों में यह सवाल भी उठा था कि क्या इस तरह की 'महामारियों'के बारे में लोगों को जागरूक बनाने की जगह आतंकित तो नहीं किया जा रहा है।
संग्रह की 'तीसरी बीवी','फूलबागान का सपना'और 'जश्न' जैसी लघु कहानियां रोजी-रोटी के अवसरों की दृष्टि से सिमटते गाँव फैलते शहरों के अंधेरे पक्ष के कटु सत्य को सामने रखती है। लिहाजा वे पाठक के मर्म को बेधती हैं। हालांकि ये कहानियां कोलकाता महानगर और उसके आसपास के परिवेश में केंद्रित हैं लेकिन ये दृश्य मुंबई, दिल्ली या ऐसे ही किसी महानगर के परिवेश की भी हो सकती क्योंकि कमोबेश कारक और हालात सभी जगह एक से हैं। हालांकि 'एक हिट भोजपुरी फिल्म की स्टोरी' जैसी कहानियों के जरिये यह अहसास कराने की कोशिश भी की गयी है कि सब कुछ नष्ट नहीं हुआ है, बेहतरी की संभावनाएं एकदम खत्म नहीं हुई हैं।
पुस्तक : तीसरी बीवी
लेखक : अभिज्ञात
प्रकाशक : शिल्पायन, दिल्ली
मूल्य : 150 रुपये
पृष्ट : 120

Tuesday, 13 April 2010

फूलबागान का सपना

साभार: द पब्लिक एजेंडा 20 फरवरी 2010



कहानी
वह मज़दूर था चटकल का। उसे सपने एकदम नहीं आते थे। अलबत्ता वह सोचता कि काश उसकी ज़िन्दगी सपना ही होती और आंख खुलते ही वह सपना टूट जाता। वह जिस हक़ीकत में लौटता वह मजदूर जीवन न होता। कठिन मशक्कत के बाद रोटियां जुटती हैं। चार-चार बच्चे हो चुके थे। जिनमें तीन तो बेटियां थीं। कैसे वह उन्हें पार लगायेगी यह चिन्ता उसे अभी से सताने लगी थी। हालांकि चिन्ता करने के लिए भी उसके पास वक्त सीमित था क्योंकि काम से बाद उसके पास इतनी थकान रहती थी कि वह बाक़ी समय में खूब सोता। नींद से उठता तो नित्यक्रम से निपटने के बाद खा-पीकर काम पर चला जाता और लौटकर सो जाता। कभी-कभी तो उसे भ्रम होता कि वह काम करने के लिए ही जी रहा है। उसके जीवन का पूरा चक्र काम को ध्यान में रखकर बना है। वह खाता है, विश्राम करता है ताकि काम कर सके। उसकी सारी गतिविधियां काम की तैयारी से जुड़ी हैं। उसकी संतानें और पत्नी की जिम्मेदारियां प्रभु ने इसलिए दी हैं ताकि उसे काम करने की वजह मिले। ये ठोस वजहें न होतीं तो शायद वह कठिन श्रम से भरे काम से विरत हो जाता।
वह दिन और दिनों से कुछ अलग सा था। मिल में असिस्टेंट मैनेजर साहब ने उसे अपने घर भेजा था मोबाइल फोन लाने, जिसे वे भूल आये थे। ड्राइवर गाड़ी लेकर उनके बच्चे को छोड़ने गया था जो दूर के स्कूल में पढ़ता था। आफिसर्स क्वार्टर मिल परिसर में ही था। सो उसे भेजा गया। वह बंगलेनुमा क्वार्टर में पहुंचा तो देखकर दंग रह गया। क्वार्टर के सामने तरह तरह के फूल। दरवाजे की घंटी बजायी तो खूबसूरत परी जैसी मेमसाहब ने दरवाज़ा खोला। ना-ना करने पर भी उसे अन्दर बिठाया गया। गंदी चप्पल को वह बाहर ही उतार आया था किन्तु अन्दर खूबसूरत कालीन पर पांव रखने का उसमें साहस नहीं हो रहा था। सोफे पर आहिस्ते से बैठा वह थोड़ा धंस गया। उसे चाय पिलायी गयी थी। इस बीच चार साल की एक गुड़िया सी बच्ची वहां परदों के बीच से झांक रही थी। वह साहब की बेटी थी। उसे अब तक पता न था कि ज़िन्दगी इतनी सुन्दर भी हो सकती है। खूबसूरत घर, सुन्दर पत्नी, सलोने बच्चे। साहब के घर से लौटने के बाद वह देर तक अनमना रहा। मन में कहीं न कहीं हसरत ने करवट ली। काश उसे भी ऐसी ज़िन्दगी मिली होती।
अगले दिन जब वह नींद से उठा तो उसे दुनिया बदली बदली सी नज़र आयी। उसने बरसों बाद फिर सपना देखा था। फूलों की क्यारियों का, फूलों के बाग का। हां उसने से एक खूबसूरत फूलबागान देखा था। फिर क्या था सपनों से निकल कर फूलबागान उसके जीवन को सुगंधित करने लगा था। एक महक थी केमिकल से नहाये पाट में जिन्हें वह चटकल में सिर पर ढोता था। बोझ उसे फूलों सा हल्का लगने लगता कई बार। धीरे-धीरे उसने जागती आंखों से भी सपने देखने शुरू किये। उसे लगा जीवन बदला जा सकता है। उसने हाजिरी बाबू से लेकर दरवानों और मिल के ट्रेड यूनियन नेताओं को खास तौर पर सलामी दागनी शुरू की। उसके स्वभाव में जो रुखापन था वह दूर होने लगा था। लोगों का व्यवहार भी उसके प्रति बदलने लगा। और वह दिन भी आया जब उसे भी उन लोगों में शुमार कर लिया गया जिन्हें खूब ओवरटाइम मिलते। उसकी कमाई बढ़ने लगी। जैसे जैसे कमाई बढ़ी उसने बचत पर और ज़ोर देना शुरू किया। वह गरीबी के चक्र से बाहर आकर रहेगा उसने प्रण किया और अपने सोचे को हक़ीकत में बदलने का उपक्रम भी शुरू कर दिया। उसने रिक्शा ख़रीदा और दूसरे को चलाने के लिए किराये पर दे दिया। रिक्शा वाले रोज सुबह उसे पहले रिक्शे का किराया देते फिर दिन भर के लिए रिक्शा ले जाते। धीरे-धीरे वह आठ रिक्शों का मालिक बन गया। आय तो बढ़ी लेकिन रिक्शावालों से आये दिन बकझक भी होता और सुबह सुबह उसका मन खराब हो जाता। उसने कमाई को दूसरा रास्ता खोजना शुरू किया और वह आखिरकार मिल गया।
उसने रिक्शे बेच दिये और एक पुराना बेडफोर्ड ट्रक खरीद लिया, बंगला डाला। यह ट्रक उसी मिल में एक ठेकेदार के अधीन चलने लगा। ट्रक उसे औने पौने दाम पर इसलिए मिल गया क्योंकि उसके पेपर नहीं थे। यह ट्रक कोलकाता फूलबागान में कटइया के लिए जा रहा था। वहां ट्रक के कबाड़ खरीदे जाते हैं और उसके पुर्जे-पुर्जे अलग करके फिर बेचे जाते हैं। टायर अलग, चेचिस अलग। नट बोल्टू अलग। पुराने ट्रकों में ये पुर्जे लगते हैं। यह पुराने ट्रकों को कब्रगाह था जहां बीमार ट्रक किसी तरह लड़खड़ाते अथवा किसी अन्य ट्रक से खींच कर ले जाये जाते और कभी वापस नहीं आते। घंटे दो घंटे में उनका अस्तित्व खो जाता।
वह जिस चाय दुकान पर बैठा चाय पी रहा था वहीं सौदा हो रहा था। पुराने खटारे बेडफोर्ड का जो दाम लगा वह महंगू को सस्ता लगा और उसने दाम बढ़ाकर ट्रक खरीद लिया। ठेकेदार को किराये पर दे दिया। ठेकेदार के पास चार ऐसे ट्रक पहले ही थे जिनके पास पेपर नहीं थे। ये ट्रक मिल में पाट और उससे बने उत्पाद को एक स्थान से ढोकर दूसरे स्थान पर ले जाने के काम में लगे थे। चूंकि ये मिल से बाहर जाते नहीं थे ऐसे में उनके लिए नम्बर प्लेट की आवश्यकता नहीं थी और ना ही उनके पेपर्स की। सो हर ट्रक का नम्बर अपनी इच्छानुसार रखा गया था। जिस नाम से उसे उन्हें पुकारा जा सके। ठेकेदार के पास फूलबागान में कटइया पर गये एक ट्रक के पेपर सस्ते में मिल गये थे। सो जरूरत पड़ी किसी ट्रक को मिल परिसर से बाहर निकालने की तो वह उन पेपरों के साथ बाहर निकालता। मिल के बाहर उसके कोई भी ट्रक निकलता तो एक ही नम्बर के साथ। इस प्रकार अब एक पेपर व वैध नम्बर पर चार ट्रक मिल में पहले ही चल रहे थे। महंगू ने डब्ल्यूबी के आगे अपनी पसंद का अंक लगाया और मिल में उसका प्रवेश करा दिया। उसने रिक्शे बेच दिये थे और कम्पनी से कर्ज लिया था और महाजनों से सूद पर रुपये किन्तु वह ट्रक मालिक बन गया था। ठेकेदार से जो किराया तय हुआ था उसके आधार पर वह जल्द ही कर्ज से मुक्त हो जायेगा और फिर बढ़ी हुई आय से उसकी ज़िन्दगी। उसकी जिन्दगी में भी फूल ही फूल होंगे। हरियाली होगी।
ठेकेदार ने एक माह तो ट्रक का किराया वक्त पर दिया किन्तु उसके बाद उसने अपना पैंतरा दिखाना शुरू किया। किराया देने में उसका टालमटोल का रवैया उसके लिए नागवार गुज़रता किन्तु महंगू के पास कोई अन्य विकल्प न था। महाजन जब घर पर आ धमकते तो वह ठेकेदार के यहां चिरौरी करने पहुंचता और अपने प्राप्य किराये का मामूली सा हिस्सा लेकर लौटता और किसी प्रकार साहूकारों से पिंड छुड़ाता। अब उसे सपने आने बंद हो गये थे। काम में मन नहीं लगता। स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था। स्वभाव में रुखापन आ गया था। बात-बात में झल्लाता। वह इधर दारू भी पीने लगा था। अब वह मिलनसार नहीं रह गया था। उसके व्यवहार में आये परिवर्तन के बाद उसे ओवरटाइम मिलना भी बंद हो गया। मिल में लिये कर्ज की वसूली के लिए उसके वेतन का एक बड़ा हिस्सा पगार से कट जाता था। काम पर न जाने की इच्छा व अस्वस्थता के कारण उसके नागे बढ़ते गये सो वेतन और सिमटता गया। वह साहूकारों को जितना पैसा हर माह लौटाता उससे अधिक ले लेता। इस प्रकार वह कर्ज के दलदल में फंसता चला गया। ठेकेदार के प्रति उसकी नफरत बढ़ती गयी। मूल कारण वही था महंगू के दुखों का। उसने ठेकेदार के चंगुल से निकलने का संकल्प लिया।
उसने तय किया कि वह किसी पुराने ट्रक का पेपर खरीद लेगा और अपना ट्रक जल्द मिल से निकाल कर सीईएससी में चलने के लिए दे देगा, वहां पैसा अधिक मिलेगा। और कर्ज मुक्त हो जायेगा। और ठेकेदार से पैसा वसूली के लिए वह थाने तक जायेगा। यह बात उसके मन में थी जो नशे की झोंक में उसके मुंह से निकल गयी। उसने रात ठेकेदार के घर जा उसे खुली चेतावनी दे डाली कि उसके पैसे लौटा दे वरना थाना कचहरी सब होगा।
अगले दिन जब वह मिल में पहुंचा तो उसके पैर के नीचे से ज़मीन खिसकती नज़र आयी। छह आदमी बड़े हथौड़ों के साथ उसके ट्रक पर वार कर रहे थे। और ट्रक के विछिन्न हिस्से एक अन्य ट्रक में लादे जा रहे थे। वहां फूलबागान का वही ट्रक दलाल बैठा था ठेकेदार के साथ जिसने उसके ट्रक का पहले सौदा किया था। उसे समझते देर न लगी कि क्या हो रहा है। वह वहां से भागते हुए सीधे थाने पहुंचा जहां उसने ठेकेदार के खिलाफ रपट दर्ज करायी कि उसके ट्रक को क्षति पहुंचायी जा रही है जो जूट मिल में चलता है। पुलिस के साथ जब वह मिल में पहुंचा तो उसके ट्रक का नामोनिशान वहां नहीं था। दलाल वहां से फूलबागान जा चुका था। पुलिस ने मिल में ट्रक न पाकर महंगू से उसके कागजात मांगे। अब महंगू को काटो तो खून नहीं। उसने जब बताया कि बिना पेपर के ट्रक मिल में चल रहा था तो उसे पुलिस ने अवैध कारोबार में लिप्त होने के आरोप में लॉकअप में बंद कर दिया।
महंगू को फूलबागान का सपना महंगा पड़ा।
साभारः नया ज्ञानोदय

एक भोजपुरी फिल्म की हिट स्टोरी

कहानी
पार्ट 1
बलिया की एक नौटंकी मंडली है। जिसके मालिक हैं राधेश्याम। राधेश्याम की यह पुश्तैनी मंडली है जो अब संकट से गुजर रही है। यह मंडली लोक-उत्सवों, मेलों, शादी-बारात आदि में अपनी कला का प्रदर्शन करती है। इसमें कई कलाकार भी ऐसे हैं जो इसमें पुश्तों से अभिनय, गायन, वादन अथवा सेट बनाने या झाडू मारने आदि का काम करते आये हैं। कुल 15 लोगों की इस मंडली का अपना एक खटारा वाहन भी है और पुश्तैनी ड्राइवर भी। मंडली के लोगों का कहना है कि एक बार अभिनय का जो चस्का लग जाता है तो फिर उसके आगे कोई और चीज नहीं रुचती। इसके कलाकार अपनी जिन्दगी में जो कुछ बनाना चाहते हैं वह नौटंकी में ही बन कर खुश हो लेते हैं। कुछ का तो यहां तक कहना है कि असली जिन्दगी तो जो एक बार बन गये सो बन गये लेकिन नौटंकी में इसकी पूरी छूट है कि राजा चाहे तो रंग बन ले और चोर चाहे तो कोतवाल। यहां ज्यादातर लोग जो सपने देखते हैं वह कुछ देर के लिए हकीकत में भी बदलते हैं भले ही वह नकली क्यों न हो इसलिए नौटंकी को बचाये रखना सबको जरूरी लगता है। कई लोगों को मुनाफे वाले काम मिले भी तो उन्हें वह नहीं जंचे। नौटंकी में राजा बना रहने वाला व्यक्ति वास्तविक जिन्दगी में नौकर नहीं बनना चाहता। और फिर उन्हें जो लोकप्रियता मिली है वह उन्हें सामान्य जिन्दगी नहीं जीने देती। कुछ लोगों ने पेशा बदलना भी चाहा तो नहीं बदल सके। लौट आये फिर नौटंकी में। ( गीत नम्बर 1-राधेश्याम गाता है जिसमें दुनिया को नाटक कहा गया है ) राधेश्याम इस बात को लेकर चिन्तित है कि लोग नौटंकी देखने के बदले अब फिल्में देखने पर जोर दे रहे हैं और उनकी मुख्य प्रतियोगिता फिल्मों से ही है। वे खुलेआम नौटंकी दल के कलाकारों से कहते हैं कि यदि उन्हें लाटरी लग गयी तो वे फिल्म बनायेंगे और उसमें टीम के पूरे कलाकारों को काम देंगे और उनके कलाकारों को मुफलिसी का सामना नहीं करना पड़ेगा क्योंकि फिल्मों में बहुत पैसा और शोहरत है। उनके पिता ने मरते समय भी उनसे वचन लिया था कि चाहे जो हो जाये तमाशा जारी रहना चाहिए और मंडली के लोगों को अपने घर का सदस्य उन्हें समझना है, उनकी जिम्मेदारियां भी निभानी हैं। उनका दुःख सुख का साथी बनना है।
राधेश्याम की उम्र लगभग पचास साल की है। पत्नी गुजर गयी है इकलौता बेटा भी नौटंकी में ही काम करता है। अक्सर वही नायक बनता है जबकि नौटंकी में नायिका का काम करने वाली लड़की के प्रति वह आकर्षित है लेकिन अभी इजहार दोनों ही ओर से नहीं हुआ है। (गीत नम्बर-2-नाटक के एक रिहर्सल के दौरान गीत में उनके मन में फूटते प्रेम के अंकुल का खुलासा होगा )।
पूरा नाटय दल एक ही बड़े मकान के विभिन्न कमरों में रहता है। यह मकान राधेश्याम का है जो जीर्ण शीर्ण अवस्था में है जो मंडली की खस्ताहाली की कहानी कहता है। राधेश्याम के दादाजी को राष्ट्रीय सम्मान मिल चुका है जो स्वयं नौटंकी के लिए मशहूर थे।
राधेश्याम को सुन्दरता से बहुत लगाव है। वह हमेशा सब से कहता है कि वे सुन्दरता पर ध्यान दें। सुन्दर लगें सुन्दर सोचें और चीजों में सुन्दरता की तलाश करें। क्योंकि तभी दुनिया सुन्दर हो सकेगी। दुनिया को सुन्दर बनाने की जरूरत है और वे चाहते हैं कि उनके इर्द गिर्द एक सुन्दर दुनिया हो। वे सभी के चेहरे पर हर वक्त मुस्कान देखना चाहते हैं। रोनी सूरत से उन्हें सख्त नफरत है। हर हाल में खुश रहने का मंत्र भी उन्हें विरासत में मिला है।
राधेश्याम अपने दिन फिरने का इन्तजार कर रहा है और वह रोज सुबह लाटरी का नम्बर मिलाता है क्योंकि वह लग गयी तो उसका फिल्म बनाने का सपना साकार हो सकता है। वरना अब दिन तो ऐसे देखने पड़ रहे थे कि नौटंकी कराने वालों से यह तक नहीं पूछते थे कि क्या लेंगे देंगे। जो मिलेगा उसी में संतोष करने के अलावा कोई उपाय न था। एक ऐसा भी अवसर भी आये जब सबको खाने के लाले पड़ गये और भोजन नहीं पका तो अपनी दिवंगत पत्नी के जेवर बंधक रखने को दे दिये जो अपनी बहू को देने के लिए उन्होंने रख छोड़ा था और पत्नी की अन्तिम निशानी थी। सभी लोग भावुक हो उठते हैं लेकिन दूसरे दिन ही तब खुशी की लहर दौड़ उठती है जब उनकी दो करोड़ की लाटरी लग जाती है।
पार्ट 2
लाटरी का समाचार सुनकर मोहल्ले में सबको मिठाइयां बांटी जाती हैं और राधेश्याम घोषणा करता है कि इस पैसे से फिल्म बनेगी। और सभी के दिन अब फिर जायेंगे। वह शहर के सिनेमाहाल में जाता है जहां एक भोजपुरी फिल्म चल रही है। वह सिनेमाहाल के मैनेजर से गुजारिश करता है कि उसे डायरेक्टर का फोन नम्बर और पते का इन्तजाम कर दे। वह फिल्म बनाना चाहता है। दूसरे दिन उसे बुलाया जाता है और फोन नम्बर पाकर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता है। वह पब्लिक टेलीफोन बूथ से डायरेक्टर को फोन करता है कि वह भोजपुरी फिल्म बनाना चाहता है कितने रुपये में बन जायेगी। जब उधर से कहा जाता है कि एक करोड़ लगेगा तो वह कहता है कि वह इतने पैसे का इन्तजाम हो गया है। डायरेक्टर उससे कहता है कि वह अगले हफ्ते ही मुंबई में उससे आकर मिले। वह फोन के पास खड़े मंडली के लोगों को बताता है कि हम सब मुंबई जा रहे हैं फिल्म बनाने तो सभी बाजार में नाचते और गाते हैं। (गीत नम्बर-3-इस गीत में लोगों की आशाओं के पूरा होने, मंगल कामनाओं की बातें और मंदिर में सबके पूजा करने का दृश्य होगा)।
पार्ट 3
ट्रेन से पूरी मंडली मुंबई पहुंचती है। वहां डायरेक्टर यह देखकर भौंचक्का रह जाता है कि राधेश्याम अकेले नहीं बल्कि पूरी मंडली के साथ आया है। वह डायरेक्टर से कहता है कि वह अपने साथ अपने पूरे कलाकार लेकर आया है और ये सभी लोग उसमें अभिनय करेंगे। गाना गायेंगे, गीत लिखेंगे और बजायेंगे, नाचेंगे। हर आदमी कई कई कलाओं में माहिर है। उसे दूसरे कमरे में बैठाकर डायरेक्टर अपने लोगों के साथ बातचीत में कहता है कि यह बड़ी गड़बड़ी हो गयी। यह तो पूरी मंडली के साथ आया है। सभी लोगों को चलता करना होगा। यदि सब कुछ यही लोग करेंगे तो फिर हमारी टीम के लोग क्या करेंगे। कई कलाकार ऐसे हैं जिनका उनके साथ लेन देन है। कुछ ऐसे भी हैं जो उनकी फिल्मों में पैसा लगते हैं उनके लोगों को दूसरी फिल्मों में भी काम देकर ओब्लाइज करना है। कुछ ऐसी लड़कियां भी हैं जिन्हें उन्होंने फिल्मों में काम देने का वादा किया है। कई दूसरे डायरेक्टरों से भी सम्बंध बनाये रखना होता है। अपने प्रिय हीरो हिरोइनों गायकों और संगीतकारों को वे क्या कहेंगे। किसी तरह मंडली के लोगों को टरकाना होगा। यह तो पूरा पैसा ही बचा लेगा। वे योजना बनाते हैं कि राधेश्याम को दुनिया की रंगीनी दिखाकर उसे शीशे में उतारना होगा। शराब और शबाब से दुनिया में बड़े-बड़े साधु संत नहीं बचे यह किस खेत की मूली है। इधर राधेश्याम एक सस्ते से होटल में पूरी टीम के साथ रहता है और फिल्म की तैयारियों में जुट जाता है। उससे डायरेक्टर कहता है कि वह उससे मिलता मिलाता रहे। फिल्म इंडस्ट्री को पहले समझे फिर तो फिल्म बनती ही रहेगी।
अब डायरेक्टर अपनी योजना के अनुसार उसे बहकाने में लग जाता है। वह उसे जहां मिलने के लिए बुलाता है वहां लड़कियां न सिर्फ डायरेक्टर से बल्कि उससे भी चिपकती हैं। और मना करने के बावजूद उसे शराब भी बार बार आग्रहपूर्वक पिलायी जाती है। उसे समझाया जाता है कि जिन्दगी रंगीन होनी जरूरी है। यह ख्वाबों की दुनिया है यहां लोग अपने ख्वाब पूरे करने आते है इसलिए जिन्दगी भी कभी कभार ख्वाब सी हसीन होनी चाहिए। एक हिट फिल्म लोगों की पूरी जिन्दगी की दिशा बदल देती है। राधेश्याम को बताया जाता है कि यदि उसे फिल्म इंडस्ट्री में रहना है तो यहां तो तौरतरीकों से परहेज नहीं करना चाहिए। शराब और शबाब के बिना यहां किसी का काम नहीं चलता। वह सबसे कटछंट जायेगा। वह जितना जल्दी यहां का रंगढंग अपना लेगा उसे सुविधा होगी।
फिर उसे नशे की हालत में समझाया जाता है कि यहां लोगों को आसमान से जमीन पर गिरने में भी देर नहीं लगती। वह जो एक करोड़ रुपये लगा रहा है यदि वह सभी महत्वपूर्ण रोल और काम काज अपने ही लोगों को देगा तो पता नहीं फिल्म का क्या होगा। बिना नाम किये लोगों की फिल्म देखने दर्शक नहीं आयेंगे तो फिल्म बुरी तरह पिट जायेगी। फिर वितरक भी नहीं मिलेंगे। उसका पैसा पानी में जायेगा। और फिर अपने घर लौट कर उसे नौटंकी करनी पड़ेगी। उसे नौटंकी और फिल्म का फर्क समझना होगा। जो लोग फिल्म इंडस्ट्री में आज हैं वे काबिल लोग हैं। उन्हें न चाहते हुए भी फिल्म में लेना पड़ता है उनके नखरे सहने पड़ते हैं उनकी बत्तमीजियां झेलनी पड़ती हैं क्योंकि वे जनता की नजर में कामयाब लोग हैं फिल्में उन्हीं के बल पर चलती हैं। (गीत नम्बर 4-किसी होटल में कैबरे नृत्य के साथ) और धीरे-धीरे राधेश्याम पर उसकी बातों का प्रभाव पड़ता है।
एक दिन अचानक उसका बदला हुआ व्यवहार होटल में उसकी टीम के लोगों को साफ दिखायी पड़ने लगता है। उनकी जिन खूबियों के लिए वह उन्हें पसंद करता है उसे खामी कहने लगता है। बात-बात पर तुनक उठता है। हमेशा चेहरे पर मुस्कुराहट रखने वाला राधेश्याम अब गंभीर रहने लगता है। डायरेक्टर उसे ले जाकर फिल्म इंडस्ट्री में जमे जमाये हीरो, हिरोइन और गायक कलाकारों को साइन कराकर एडवांस दिला देता है। हालांकि उसकी यह बात मान ली जाती है कि राधेश्याम के साथ आये कलाकारों को भी कम महत्व के रोल दिये जायेंगे।
पार्ट 4
फिल्म की शूटिंग शुरू हो गयी। अब राधेश्याम को काटो तो खून नहीं। वह मुंबई के कलाकारों का अभिनय देखकर कूढ़ता रहता है। उसे अपने अन्दर का डायरेक्टर लानते भेजता है। उसने अपनी मंडली के कलाकारों के साथ जो दूरी बना रखी थी उसे दूर करता है और अपना दुख बांटने लगता है। उसे अफसोस होता है कि कलाकार हिन्दी डायलाग बोल रहे हैं उन्हें भोजपुरी बोलनी नहीं आ रही है। भोजपुरी जीवन के तौर तरीकों से भी फिल्म का कोई वास्ता नहीं दिखायी पड़ता न ही पहनने और व्यवहार का तौरतरीका ही भोजपुरिया है। अभिनय का कच्चापन साफ दिखता है। सही अभिनय कैसा होना चाहिए उसके कलाकार फिल्म की शूटिंग से थोड़ी दूर पर करकर के दिखाते हैं और मन मसोस कर रह जाते हैं। सभी कलाकार बार बार तैयार होते हैं कि शायद उन्हें अब भूमिका करना पड़ेगी मगर बहुत मुश्किल से कोई काम मिलता है और तनिक भी गलती होने पर उन्हें डायरेक्टर की जोरदार फटकार मिलती है और वह उन्हें अपमानित भी करता है कि काम तो आता नहीं चल दिये रोल करने। नौटंकी और फिल्म बड़ा फर्क होता है। फिल्म में जिसे नायिका रखा जाना चाहिए था नौटंकी की उस नायिका को झाड़ू मारने की एक छोटी सी भूमिका दी जाती है और उसे ऐसा मेकअप किया जाता है कि वह कम सुन्दर लगे क्योंकि तमाम मेकअप के बावजूद असली नायिका उसके आगे एकदम फीकी पड़ रही थी। नायक गंजा और 50 साल का था जिसे 22 साल के युवक की भूमिका दी गयी थी। मेकअप के बावजूद उसका बुढ़ापा झांक रहा था जबकि राधेश्याम के बेटे को चपरासी की छोटी भूमिका मिली थी जिस पर नायक नायिका दोनों लिपट कर रो पड़ते हैं और एक दूसरे के और करीब आते हैं। नायिका को झाड़ू मारने के दृश्य की शूटिंग में तो वह राधेश्याम खुद भी रो पड़ता है। वह अपने आप से कहता है कि यह जघन्य पाप उससे हो रहा है जिसे नौकरानी बनना चाहिए था वह रानी बनी है और दोनों की भूमिका उल्टी है। इधर गांव से फोन आता है कि कौन कौन कौन सा रोल कर रहा है। जरूर नायक नायिका ही नायक नायिका फिल्मों में होंगे। वे लोग फोन राधेश्याम को पकड़ा देते हैं। राधेश्याम को लोगों को जवाब देते नहीं बनता वह कहता है कि गांव के लोगों की आवाज साफ सुनायी नहीं दे रही है। और वह फूट-फूट कर रोता है। (गीत नम्बर-5 होटल में एक दर्द भरा गीत नौटंकी का एक कलाकार गाता है पूरबी)

पार्ट 5
इस बीच नौटंकी वाले जिस होटल में ठहरे रहते हैं वहां फिल्म का असिस्टेंट डायरेक्टर भी आता है। वह बताता है कि उसने एक जमाने में कई हिट फिल्में दी थीं फिर उसने अपने पैसे से फिल्म बनायी जो पिट गयी और उसका सब कुछ बिक गया। वह असिस्टेंट बनने को मजबूर हो गया है। किन्तु वह उन लोगों की बातें सुनता रहता है वह उनसे हमदर्दी रखता है। वह उनकी मदद कर सकता है। वह कम से कम पैसे में उनकी फिल्म बना देगा क्योंकि जिस तरह से काम चल रहा है डायरेक्टर उससे एक करोड़ के बदले डेढ़ करोड़ वसूलने की फिराक में है। बजट बढ़ने जा रहा है। वह कहता है कि वह राधेश्याम की मंडली के लोगों को लेकर ही हिट फिल्म बनायेगा उसे बस वे एक मौका दे दें इससे वह खुद भी अपनी विफलताओं से बाहर आ जायेगा। दोनों का फायदा होगा। आखिरकार राधेश्याम अपने डायेरक्टर से कह देता है वह फिल्म से डायरेक्टर को निकाल रहा है और असिस्टेंट डायरेक्टर ही फिल्म पूरी करेगा। इसके बाद तो पुराने सारे कलाकार हटाये जाते हैं नौटंकी वाले नायक नायिका फिल्म में नायक नायिका बन जाते हैं। (गीत नम्बर- 6-दोनों पर एक गाना फिल्माया जाता है)
गीत के दौरान ही दृश्य दिखाये जाते हैं जिसमें फिल्म का विभिन्न सिनेमाघरों में प्रदर्शन हो रहा है। आटोग्राफ लेने वालों की भीड़ है। राधेश्याम और उनकी नौटंकी टीम बलिया आती है जहां सिनेमाघर में उनकी फिल्म लगी है। लोगों की अपार भीड़ लगी है और फूल मालाओं से उनका स्वागत लोग करते हैं।
अन्त में बताया जाता है कि राधेश्याम की फिल्म को एवार्ड मिल गया। नायक नायिका की शादी हो जाती है और शादी के बाद नायिका फिल्म छोड़कर बच्चे सम्भाल रही है। जबकि नायक की कई फिल्में हिट हो गयी हैं। असिस्टेंट डायरेक्टर फिर फिट डायरेक्टरों में गिने जाने लगे हैं। मंडली के बाकी सदस्य भी मुंबई में काम में व्यस्त हैं। फिल्म इंडस्ट्री उन्हें रास आ गयी है।
समाप्त।
साभारः इंडिया न्यूज़

मुक्ति


कहानी
सर्दी शुरू ही हुई थी। मध्य एशिया के साइबेरिया से अपने तमाम दोस्तों के साथ उड़कर आया था ग्रे हंस। बल्लभपुर की झील में उतर ही रहा था कि गोली लगी। वह गिरा तो लहू लुहान था। वन्य प्राणियों से हितों के संरक्षण की आवाज़ बुलंद करने वाले स्वयं सेवी संगठन ने न सिर्फ उसका बचाव किया बल्कि उस शिकारी को भी पकड़ लिया जिसने उसे अपना निशाना बनाया था। शिकारी को न सिर्फ़ पुलिस के हवाले किया गया बल्कि उसके ख़िलाफ़ थाने में एफआईआर भी दर्ज़ करायी गयी। संस्था ने थाने में जो अभियोग दायर किया था उसके मुताबिक़ पश्चिम बंगाल के वीरभूम की झीलों में सुदूर साइबेरिया मध्य एशिया से पंछी आते हैं। यहां अण्डे देते हैं। यहीं उन्हें सेते भी हैं। उनके चूजे धीरे-धीरे उड़ना सीखते हैं। और जब तक सर्दियां ख़त्म होती हैं वे परिवार उड़ जाते हैं और मूल स्थान की ओर। विदेश के बाज़ार में इन पंछियों की अच्छी ख़ासी क़ीमत है सो इन पंछियों को पकड़ने की फ़िराक़ में पंछी तस्करों का पूरा गिरोह सक्रिय है। उनके अण्डे चुरा लिये जाते हैं। उन्हें अन्य पंछियों से सेवाकर उनके चूजों को बेच दिया जाता है। बड़े पंछियों को एक ख़ास तरह की गोली उनके दाएं हिस्से में मारी जाती है। जख़्मी हालत में वे शिकारी की गिरफ््त में आ जाते हैं। ठीक हो जाने के बाद उन्हें भी बाज़ार के हवाले कर दिया जाता है। बिहार के दुमका में इन पंछियों की ख़रीद फ़रोख़्त का लम्बा चौड़ा बाज़ार है। वहां से ख़रीद कर उन्हें पटना ले जाया जाता है। पटना से वे विदेश भेजे जाते हैं। चूंकि मामला दो राज्यों का हो जाता है इसलिए वन विभाग द्वारा इन पर रोक लगाने की कोशिश कर भी विफल ही रहती है। कई कानूनी अड़चनें भी आती हैं।
मामला शुरू हुआ। शिकारी अंतरराष्ट्रीय गिरोह से जुड़ा था सो निपटने की कोशिश शुरू हुई। हंस को पहले तो वनविभाग में इलाज के लिए भेजा गया। अदालत में पड़ने वाली तारीख़ों में बतौर सबूत के हंस को पेश करने की जरूरत अदालत ने महसूस की। इसलिए स्वस्थ हो जाने पर भी उसे मुक्त नहीं किया गया। पेशियों का सिलसिला सवा दो साल चलता रहा। हंस लगातार क़ैद भुगतता रहा। मुकदमा ठोंकने वाली संस्था के पदाधिकारियों पर शिकारी गिरोह का ऐसा जादू चला कि गवाह मुकर गये। पुलिस शिकारी को ही बचाने में लगी रही। अदालत ने आख़िरकार अपना फ़ैसला सुना दिया। शिकारी गवाहों और सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। उसकी एक वज़ह तो यह रही कि हंस के जख़्म महीनों पहले ही सूख गये थे। अदालत में अपने जख़्मों के बारे में स्वयं हंस कुछ कह नहीं सकता था।
अदालत ने वन विभाग को आदेश दिया कि हंस को मुक्त कर दिया जाये। फ़ैसले की रात वन विभाग के कार्यालय में शानदार दावत हुई। दावत में शिकारी, पुलिसवाले व वनविभाग के अधिकारी शामिल थे। पैग पर पैग खाली होते गये। उनकी प्लेटों में हंस का तला हुआ नर्म व लज़ीज गोश्त था, जिसे बड़े चाव से खाया जा रहा था। दावत के दूसरे दिन पूरे विश्वास के साथ रिपोर्ट फ़ाइल कर दी गयी कि हंस को मुक्त कर दिया गया है।
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साभारःकादम्बिनी

औलाद

  कहानी

 -डॉ.अभिज्ञात
नरेश दंग रह गया, जब स्वयं नवजात बच्चे की मां ने लगभग उनींदी स्थिति में उससे कहा-"डा.प्लीज़, थोड़ी मेरी हेल्प कीजिए। यह बचना नहीं चाहिए।"
उसे उपने कानों पर सहसा यकीन नहीं हुआ। उसे लगा उसे सुनने में कुछ ग़लती हुई है। उसने फिर पूछा-"क्या कहा आपने नीना जी?
-"आपने ठीक सुना। आप बच्चे को बचाने की कोशिश मत कीजिए। मैं नहीं चाहती कि यह रहे। यह मेरे कैरियर का सवाल है। मैं एक एयर होस्टेस हूं। मेरे कैरियर में बच्चे व पति का कोई स्थान नहीं है।"
-"फिर आपने ऐसा किया ही क्यों? क्या आप नहीं जानतीं थीं कि यह होगा?"
-"अब छोड़िए भी कि क्या मैं जानती थी और क्या नहीं। दरअसल मैंने जो कुछ सोचा था वह नहीं हुआ। एकदम नहीं। मैं जिससे प्यार करती थी मैं उसके साथ घर बसाना चाहती थी। उसने ऐन वक्त पर धोखा दे दिया। शादी से ही इनकार कर गया। मैं पहले ही बच्चा गिराना चाहती थी लेकिन उसने झांसा दिया कि ऐसा क़दम उठाने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि उसके घर वाले उसे इसी हालत में अपना लेंगे। वह जब अपनी बात से फिरा तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने साफ़ कह दिया अब कुछ नहीं हो सकता काफी वक़्त बीत चुका है और अब एबार्शन नहीं हो सकता। मैंने इसे मज़बूरी में जन्म दिया है महज अपनी जान बचाने के लिए। मैं अपने प्रेमी को खो चुकी हूं। अब नौकरी से भी हाथ नहीं धोना चाहती और ना ही लोगों के ताने सुनने के लिए तैयार हूं। मैं इस बच्चे से छुटकारा पाना चाहती हूं। यह तक नहीं जानना चाहती कि यह बेटा है या बेटी। मेरे लिए बस यह मुसीबत है और मुझे इससे छुटकारा दिलाइये। मैं आपको लाख-डेढ़ लाख दे सकती हूं। ले लीजिए। आपके काम आयेंगे। देख रही हूं आप इसकी सेहत को लेकर परेशान हैं। कह रहे थे कि आठ महीने का ही है इसलिए हालत थोड़ी गंभीर है। आप यूं ही छोड़ दीजिए न। अपने आप आपका और मेरे दोनों का काम हो जायेगा।"
-"माफ़ कीजिए. मैं ऐसा नहीं कर सकता। यह मेरा बच्चा है। मेरा पहला बच्चा जिसे मैंने जन्म दिया है। मेरे डॉक्टरी के कैरियर की पहली उपलब्धि। थोड़ा कमज़ोर ज़रूर है लेकिन जल्द ही ठीक हो जायेगा और मेरा यक़ीन है यह किसी भी मामले में किसी भी बच्चे से पीछे नहीं रहेगा। यह बेटा है। मेरा बेटा जिसे मैंने जन्म दिया है। आपसे अधिक मेहनत मैंने की है। मेरी जान टंगी हुई थी इसे लेकर। कितना सुन्दर है, कितना प्यारा। जल्द ही यह हंसेगा। कुछ दिन में बोलेगा। और यह तो तय है कि रहेगा दुनिया में। सालों साल। हमारे बाद भी।"
-"यू शटअप। यह तुम्हारा बच्चा कैसे हो गया डॉक्टर?... अच्छे सिरफिरे से पाला पड़ा है। कुछ कर सकते हो तो करो वरना मैं कोई दूसरा उपाय करूंगी। तुम नहीं मानोगे तो इस नर्सिंग होम का मालिक मान जायेगा। यही होता कि जो मैं तुम्हें दे रही हूं वह उसके हिस्से चला जायेगा। कुछ और भी लगा तो मैं उसे दे दूंगी। खैर, इससे तुम्हारा क्या। तुम तो बस यह बताओ कि मेरा काम करोगे या नहीं। तुम्हें बस इतना ही करना है कि उसकी तबीयत बिगड़ ही है उसका इलाज मत करो। सुबह तक सब अपने आप ठीक हो जायेगा। तुम पर कोई उंगली नहीं उठेगी। तुम्हारे इंचार्ज को भी कुछ नहीं पता चलेगा। और चाहो तो..... तुम डॉक्टर हो। यह खेल मिनटों में सलट सकता है।"
-"आप अपनी लिमिट में रहिए और मैं जो कर रहा हूं बच्चे की भलाई के लिए करने दीजिए।"
नरेश कुछ सोचता हुआ तेजी से उस कमरे से बाहर निकला। उसने अपने पिता को फ़ोन लगाया-"पापा मैंने उस बच्चे को जन्म दिया है जिसके बारे में कल आपको बता रहा था। मां-बच्चा दोनों ठीक हैं। बस बच्चा थोड़ा कमज़ोर है पर स्थिति काबू में है। लेकिन एक मुश्क़िल खड़ी हो गयी है बच्चे की मां उसे अपने पास नहीं रखना चाहती। मैं सोचता हूं क्यों न हम ही उसे अपने पास रख लें।"
-"पर बेटा। हम दूसरे के बच्चे को कैसे ले सकते हैं। उसकी तमाम ज़िम्मेदारियां उठानी होंगी। यह एक गंभीर मामला है। आनन-फानन में निर्णय नहीं लिया जा सकता। बेटा अब में रिटारमेंट के क़रीब हूं। मैं अभी तुम भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं हुआ हूं। फिर एक और ज़िम्मेदारी उठाना मेरे वश में नहीं है।"
-"पापा मैं उसे इस हालत में नहीं छोड़ सकता। उसकी मां उसे नहीं छोड़ेगी और मैं अपने पहले बच्चे को यूं नहीं मरने दूंगा। आप कुछ नहीं कर सकते तो मैं इसे गोद ले लूंगा।"
-"अरे अभी तुम्हारी शादी तक नहीं हुई। तुम यह निर्णय अकेले कैसे ले सकते हो? इतना सेंटीमेंटल बनने से काम नहीं चलेगा। बी प्रैक्टिकल।"
-"सारी समस्या तो अधिक प्रैक्टिकल बनने से ही पैदा हुई है। आप कुछ कीजिए। आपको कोई न कोई रास्ता निकालना ही होगा। आप इस समस्या से भले मुंह फेर लें मैं मुंह नहीं फेर सकता। यह मेरे वश में नहीं है।"
अभी नरेश ने फ़ोन डिस्कनेक्ट किया ही था कि फ़ोन बजने लगा। उसने मोबाइल पर नाम देखा। डॉ.आरएमजी ....यह उसके बॉस का फ़ोन था। इस नर्सिंग होम के मालिक का। पहले तो उसका मन बात करने का नहीं कर रहा था किन्तु अधिक देर तक रिंग होती रही तो उसने फ़ोन रिसीव कर लिया-"डाक्टर नरेश! यह क्या बचपना है? क्लाइंट की मदद करो। हमें अपना दिमाग़ ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। वह अच्छी ख़ासी रकम दे रही है। मैं चाहता हूं तुम मामले को ठीक से हैंडल कर लो। यह आये दिन का मामला है। तुम जो चाहो बना लो। हम भी कुछ न कुछ पा जायेंगे। तुम्हारे आटीट्यूड से तो हमारा धंधा चौपट हो जायेगा। करोड़ों रुपये घुस गये हैं यह नर्सिंग होम बनाने में। क्या आदर्श बघारने के लिए हमने डॉक्टरी का प्रोफेशन अपनाया था। यह काम हम नहीं करेंगे तो लोग अपने यहां क्या करने आयेंगे। नार्मल डिलीवरी का केस को कहीं भी हैंडल हो जाता है क्या उन्हें नहीं पता है। सत्तर-अस्सी हजार तक लेते हैं हम। क्लाइंट को भी तो कुछ सुविधाएं देनी होंगी। क्लाइंट को क्या चाहिए यह हम नहीं तय कर सकते। यह उसकी बात है। हमें उसे कोआपरेट करना होगा। सबकी अपना मुश्कि़लें होती हैं और अपने अपने लाज़िक। उन्हें अपने ढंग से जीने दो। तुम क्या सोचते हो तुम नहीं करोगे तो दूसरे डॉक्टर नहीं हैं क्या? तुम्हारे सभी कलीग यही करते हैं। तुम अभी नये-नये हो। तुम्हें यह सब जल्द से जल्द सीख लेना चाहिए। इमोशन बेवकूफ़ों की चीज़ है। अभी मेरे पास फ़ोन आया था नीना का। डू इट ह्वाट शी वांट।"
-"लेकिन सर...।"
उसे कुछ बोलने का मौका नहीं दिया गया था। फ़ोन डिस्कनेक्ट कर दिया गया। इसी बीच नीना की मां वहां गुस्से से पैर पटकती हुई आ पहुंची। उसके साथ एक काला-कलूटा आदमी था। वह हाव-भाव से ही नशे में धुत्त लग रहा था। नरेश ने दिमाग़ पर ज़ोर डाला तो पहचान गया। वह इसी मोहल्ले में ड्रेन की साफ़-सफ़ाई करता है। जब वह नाइट ड्यूटी के बाद सुबह घर जाने के लिए मोटरसाइकिल पर चढ़ने जाता था तो दो एक बार ड्रेन साफ़ करने के उपक्रम में देख चुका है। कभी-कभार वह रात में नशे में धुत्त हो हंगामा भी करता देखा गया है। पास ही बनी झोपड़पट्टियों में से किसी एक में वह रहता है। जल्द ही नरेश को नीना की मां की प्रतिक्रिया से यह भान हो गया कि बच्चे को झाड़ूदार के हवाले करने की योजना बनी है। नीना की मां ने उससे यह किया है कि वह बच्चे को किसी झाड़ी में छोड़ आये...बदले में उसे पांच हजार रुपये दिये जाने हैं।
नरेश ने नीना की मां को बच्चे के पास जाने से रोक दिया। वह उस पर बिफर पड़ी थी-"तुम चाहते क्या हो? तुम जैसे डॉक्टर बहुत देखे हैं। हमारा बच्चा है, हम जो चाहें करें। तुम बेवकूफ़ हो। तुम्हें तो हम बहुत पैसे दे रहे थे। अब देखो कि वही काम कैसे केवल पांच हजार रुपये में हो रहा है। झाड़ियों में से कोई जानवर बच्चे को उठा ले जायेगा और प्राब्लम साल्व। हम परेशान हैं... हमारी परेशानी और ना बढ़ाओ। हालांकि तुम हमारे लिए कुछ नहीं कर रहे हो फिर भी तुम्हें भी कुछ- न- कुछ दे ही देंगे। बस मुंह बंद रखो वरना हम तुम्हारे मालिक से सीधे सलट लेंगे।"
नरेश अड़ गया। उसने मामला पुलिस में ले जाने की धमकी दी। इसी बीच फ़ोन की रिंग फिर हुई। उसके पिता का फ़ोन था। उनके लहज़े में खुशी साफ झलक रही थी-"बेटे तुम्हारा काम हो गया। मेरे एक दोस्त है, वे संतानहीन हैं। वे तुम्हारे बच्चे को गोद ले लेंगे। तुम बच्चे की मां और उसके घरवालों को वहीं रोककर रखो। हम वकील के साथ वहीं पहुंच रहे हैं। कानूनी लिखा-पढ़ी के साथ गोद लिया जायेगा ताकि बाद में कोई लफ़ड़ा नहीं हो।"
इधर, नीना और उसकी मां ने तुरंत बच्चे को दूसरे को देने पर अपनी हामी भर दी और वे तुरंत घर लौटने की तैयारी करने लगे। नरेश ने काफी अनुरोध किया कि वे थोड़ी देर रुकें जिससे कि कानूनी लिखा-पढ़ी हो सके। वे क़ानून का लेने की धमकी के बाद ही रुके। थोड़ी ही देर में नरेश के पिता, उनके मित्र, मित्र की पत्नी व उनका वकील वहां हाज़िर थे। हस्ताक्षर कर लिये गये।
इधर वे सभी बच्चे की ओर मुखातिब थे जबकि नीना व उसकी मां ने बच्चे को जन्म के बाद से उसकी तरफ़ देखा तक नहीं था। वे दोनों नीचे उतरीं और कार से अपने गंतव्य की कूच कर गयीं। अभी भी भोर की पहली किरण नहीं फूटी थी। तमाम मुश्क़िलों के बाद बरसों से तरसती एक अधेड़ दम्पति को इस तरह संतान नसीब हुई थी लेकिन यह क्या.....। बच्चे की नयी मां ने बहुत हौले से उसे छुआ लेकिन बच्चे में कोई हलचल नहीं हुई। वह फूट-फूट कर रोने लगी। बच्चे को एक वैध मां-बाप तो मिल गये थे लेकिन उसने उन्हें देखने से पहले ही दुनिया छोड़ दी थी। नरेश ने पाया कि बच्चे का ही नहीं उसका अपना शरीर भी जैसे काठ का हो गया हो। आखिर औलाद तो डॉक्टर नरेश ने ही खोयी थी।
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साभारःआउटलुक

जीवनस्पर्श की कहानियां: तीसरी बीवी

-संजय कुमार सेठ/पुस्तक वार्ता ------------- हृदय’ और ‘बुद्धि’ के योग से संयुक्त ‘अभिज्ञात’ का ज्ञात मन सपने देखता है। ये सपने भी रो...